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250 रुपये के रिश्वत के कलंक को धोने में लगे 28 साल, रिटायरमेंट के बाद भी है इस बात का इंतजार

Thu, 06 Jun 2019 02:01 PM IST
पूजा त्रिपाठी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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फाइल फोटो - फोटो : PTI
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दिल्ली के 79 वर्षीय जगन्नाथ ने 28 साल तक जिस पीड़ा का सामना किया वह शब्दों में भी बयां नहीं की जा सकती। हालांकि अब वह एक पीड़ा से तो उबर गए हैं लेकिन उन्हें पूरे न्याय का इंतजार है। ये सारी लानत उन्हें एक छोटी सी रिश्वत लेने के आरोप के चलते झेलनी पड़ी। 28 साल बाद वह भले ही इस आरोप से बरी हो गए हैं लेकिन वह अब भी अपनी ग्रैच्युटी का इंतजार कर रहे हैं।

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दरअसल 28 साल पहले जगन्नाथ पर आरोप लगा था कि उन्होंने दिल्ली नगर निगम में नौकरी करते हुए एक गाय को जब्त किया था जिसे छोड़ने के लिए 250 रुपये रिश्वत ली थी। हालांकि अब वह इस आरोप से बरी हो चुके हैं। लेकिन उनके जीवन के 28 साल इस आरोप के साथ गुजरे। 

जगन्नाथ कहते हैं, हालांकि मैं 2002 में रिटायर हो गया था लेकिन आज तक मेरी ग्रैच्युटी नहीं मिली है। लेकिन मुझे डर है कि कोई भी रिकॉर्ड नहीं मिलेगा क्योंकि 10 साल से पुराने जो रिकॉर्ड होते हैं उसे मेंटेन नहीं किया जाता है।

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जगन्नाथ के परिवार में 8 सदस्य हैं, 2002 में उन्हें ट्रायल कोर्ट ने दोषी ठहराया था। उन्हें 1991 में कथित रूप से एंटी करप्शन ब्यूरो(एसीबी-सीबीआई) द्वारा घूस लेते शिकायतकर्ता राम की शिकायत पर पकड़े गए थे। राम ने अपनी शिकायत में कहा था कि जगन्नाथ ने उससे जब्त गाय छोड़ने के लिए घूस मांगी थी। उस वक्त एमसीडी तीन भागों में नहीं बंटी थी और जगन्नाथ उसमें मुंशी थे।

एसीबी-सीबीआई ने अपनी जांच में पाया था कि जगन्नाथ ने घूस ली थी। उन्होंने ये भी दावा किया था कि बाद में जगन्नाथ के जेब से वो पैसे भी मिले थे। जगन्नाथ को इस जुर्म के लिए 3 साल तक सस्पेंड कर दिया गया था।

इस दौरान उनके परिवार जिसमें उनका दिव्यांग बेटा भी है, को कठिन हालातों का सामना करना पड़ा। उनके बच्चों के अनुसार उन सबको इस इल्जाम की वजह से काम करते हुए पढ़ाई करके दिन गुजारने पड़े।
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उनके बेटे रवि का कहना है कि वह सिर्फ 16 साल का था जब ये हुआ। मेरे पिता ने हमें बताया कि हम सबको अपने जीवन-यापन के लिए काम भी करना पड़ेगा। हमने पढ़ाई और कमाई दोनों की ताकि रोटी मिल सके। ये सारी स्थिति तब जाकर ठीक हुई जब पिता दोबारा बहाल हुए।

जगन्नाथ जो शुरू से खुद को बेगुनाह बताता रहा उसे फरवरी 2002 में सत्र न्यायालय ने एक साल की कैद और जुर्माने की सजा सुनाई। तब उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट में अपील की। 9 अप्रैल 2002 को अदालत ने सत्र न्यायालय के फैसले को निलंबित कर दिया।
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