मुश्किल घड़ी आपके सामने यही सवाल खड़ा करती है कि क्या आप मजबूत हैं? अगर हैं तो ऐसा बने रहने के लिए आपको क्या करना है। खुद पर भरोसा करने वाले लोगों को इसका जवाब खोजना नहीं पड़ता, उन्हें अपना रास्ता साफ नजर आता है।
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मार्क ने बताया कैसे बर्फीली गुफा में पैर गंवाने के बावजूद रचा इतिहास
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दोनों पैर गंवा देने के बावजूद दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को फतह करने वाले शख्स के मुंह से निकली यह बात उन्हें सुनने के लिए बैठे सैकड़ों लोगों को 100 फीसदी सच लगी।
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यह शख्स हैं न्यूजीलैंड के मार्क इंग्लिस और उन्हें सुनने के लिए मौजूद थे मारुति कंपनी के अधिकारी व कर्मचारी। मार्क शनिवार को सेक्टर-18 स्थित मारुति कंपनी पहुंचे और कर्मचारियों को प्रोत्साहित किया।
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मार्क ने कहा कि अपने आप में विश्वास बनाए रखें और अपनी कमी को ताकत के रूप में बदलें। जब खुद को दूसरों की नजर से देखेंगे तब समझ में आएगा कि वो आपके बारे में क्या सोचते हैं।
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मार्क को देखकर और उनकी बातों को सुनकर वहां मौजूद हर शख्स जोश और जुनून से भर गया। मारुति उद्योग कामगार यूनियन के महासचिव कुलदीप जांघू ने कहा कि हमें उनसे बहुत बड़ा संदेश मिला। हमें उनसे कामयाब होने और कामयाब बने रहने का गुर सीखने को मिला।
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मार्क ने बताया कि उन्हें 11 साल की उम्र में ही पहाड़ पर चढ़ने का शौक हो गया था। करीब 18 वर्ष की आयु में वे पहाड़ पर चढ़े। इसके बाद इन्होंने पहाड़ों में फंसे लोगों को निकालने का कार्य शुरू किया।
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23 साल की उम्र में 1982 में ऐसे पहाड़ पर चढ़ाई शुरू की, जहां 150 किलोमीटर की गति से हवा चल रही थी। यहां 13 दिन लगातार बर्फीली गुफा में फंसे रहने से उनके दोनों पैर गल गए थे। वहां तापमान शून्य से 13 डिग्री कम था।
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इन 13 दिनों में उनका वजन 70 किलो से घटकर 39 किलो हो गया था। इसके बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी।
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हादसे के 19 साल बाद एवरेस्ट फतह- घटना के 19 वर्ष बाद 15 मई 2006 को उनका माउंट एवरेस्ट पर पहुंचने का सपना पूरा हुआ। उन्होंने कहा कि एवरेस्ट पर चढ़ना तो मुश्किल है, लेकिन उतरना और भी मुश्किल है। वह इससे पहले साइकिलिंग पैरालंपिक गेम में भी सिल्वर मेडल ले चुके हैं।