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दर ब दर, बेघर, अपनी तो दिल्ली यही है

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हर साल ढेरों लोग देश के दूसरे राज्यों से रोजी-रोटी की तलाश में देश की राजधानी आते हैं। ग़रीबी के कारण ये लोग रोड को बिस्तर और आसमान को छत बना लेते है। बिरजू बताते हैं कि वो झारखण्ड से हैं और 15 साल की उम्र से दिल्ली में रह कर रिक्शा चला रहे हैं। पैसा बचाने के लिए वो रोड पर ही सोते हैं। (सभी फोटो: बीबीसी हिंदी)
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दर ब दर, बेघर, अपनी तो दिल्ली यही है

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तेज-रफ़्तार गाड़ियों से अक्सर रोड पर सोने वालों को हादसों का सामना करना पड़ता है, पर इनके पास कहीं और जाने का रास्ता भी नहीं हैं।
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दर ब दर, बेघर, अपनी तो दिल्ली यही है

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चित्ता को याद भी नहीं कि वो कहाँ से आए हैं। वो दिल्ली की सड़कों पर काम करते हुऐ बड़े हुए हैं। उनके यार-दोस्त भी वही हैं जिनका घर-बार राजधानी की सड़कें हैं।

दर ब दर, बेघर, अपनी तो दिल्ली यही है

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बिरजू और उनके दोस्त कहते हैं कि सड़क पर कौन सोना चाहता है, पर इस शहर में खाने-पीने का ही बंदोबस्त हो जाए वही बहुत है।
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दर ब दर, बेघर, अपनी तो दिल्ली यही है

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बिरजू कहते हैं कि सरकार की तमाम योजनाएं यहाँ ओवरब्रिज के नीचे सोने वालों तक कभी नहीं पहुँचती।
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दर ब दर, बेघर, अपनी तो दिल्ली यही है

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इन्होंने अपना नाम नहीं बताया, ये कहते हुए कि फोटो छपने बाद पुलिस उनके सोने की जगह को बंद करा सकती है।
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दर ब दर, बेघर, अपनी तो दिल्ली यही है

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दिल्ली में रहने वाले बेघर लोगों में काफ़ी लोग नशे की लत के शिकार हो जाते हैं।

दर ब दर, बेघर, अपनी तो दिल्ली यही है

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निज़ामुद्दीन स्टेशन के बाहर मौजूद ये शख्स ट्रैफिक के कम होने का इंतज़ार कर रहे हैं ताकि सो सकें।

दर ब दर, बेघर, अपनी तो दिल्ली यही है

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दिन में भीख मांग कर अपना पेट भरने वाली इस महिला ने अपना नाम तो नहीं बताया पर उनको यहाँ रहते हुए 35 साल हो गए हैं।

दर ब दर, बेघर, अपनी तो दिल्ली यही है

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दिल्ली में कई ग़ैर सरकारी संगठन, महिला और बाल विकास मंत्रालय हैं, पर यहाँ रोड पर सोते हुए बच्चों की चिंता करने वाला कोई नहीं।
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दर ब दर, बेघर, अपनी तो दिल्ली यही है

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यहाँ ज़्यादातर लोगों की आंखों में कोई सपना नहीं हैं। बस किसी तरह दो वक़्त के खाने का इंतजाम करना ही इनकी प्राथमिकता है।
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