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गरीबों के लिए सस्ते सैनेट्री पैड्स ने दिलवाया अंशू को मैगसेसे

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एशिया का नोबेल कहे जाने वाले रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड के लिए इस बार भारत की दो हस्तिओं को चुना गया है। भारतीय फॉरेस्ट सेवा के अधिकारी संजीव चतुर्वेदी के साथ दिल्ली में एक एनजीओ चलाने वाले अंशू गुप्ता को भी इस पुरस्कार के लिए चुना गया है।
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अंशू को आज भले की रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड मिल गया है लेकिन उनके काम के बारे में अभी कम लोग ही जानते हैँ। दिल्ली के सरिता विहार में काम करने वाली इनकी गैरसरकारी संस्‍था (NGO)'गूंज' को चलाने के लिए अंशू ने कार्पोरेट की अपनी नौकरी छोड़ दी।
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1999 में स्‍थापित इनकी संस्‍था देश के 21 राज्यों में काम करती है। 1999 में उन्होंने इस्तेमाल किए गए 1000 टन कपड़ों और घरेलू वस्तुओं को रिसाइल कर गरीबों के इस्तेमाल के लिए सामान बनवाया और उन्हें जरूरतमंदों के बची बंटवाने का काम किया।

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अंशु यहीं नहीं रुके अब वह हर साल अपने 500 कारसेवकों और 250 सहयोगियों की मदद से 1000 टन इस्तेमाल हुए कपड़ों को रिसाइकल कर गरीबों में बंटवाने का काम करते हैं।
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2004 में सुनामी का शिकार हुए दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडू में इनकी संस्‍था ने विशेष कार्यक्रम चलाया जिसे इन्होंने 'नॉट जस्ट ए पीस ऑफ क्लॉथ' (NJPC) का नाम दिया।
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कैंपेन इतना सफल हुआ कि दान में जुटाए गए कपड़ों को उनकी संस्‍था ने साफ करवाया और 2014 में इन्हीं कपड़ों की मदद से 25 लाख टन सैनेट्री पैड्स का निर्माण करवाया।
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संस्‍था ने सुनामी के दौरान जमा किए गए कपड़ों की मदद से सैनेट्री पैड्स का निर्माण करवा 'माई पैड्स' (My Pads) नाम से कैंपेन चलाया।

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इस कैंपेन के माध्यम से वो महिलाएं जो बाजार में बिकने वाले सैनेट्री पैड्स को नहीं खरीद सकती थीं उन्हें नाम मात्र की कीमत पर मात्र दो रुपये की कीमत पर इन्हें बंटवा दिया।

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गूंज के इस प्रयास को अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली और विश्व बैंक ने अंशु की संस्‍था को ग्लोबल डेवलपमेंट मार्केटप्लेस अवार्ड और चेंजमेकर्स इनोवेशन अवॉर्ड से सम्मानित किया।

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गूंज की इस अनोखी पहल का इतना प्रभाव पड़ा कि 2012 में नासा, नाइकी और यूएस एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट की मदद से बियोंड वेस्ट (Beyond Watse) नाम की थीम पर एक इनोवेशन चैलेंज का अयोजन किया गया।

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संस्था ने 2009 में गांधी जयंती के मौके पर एक हफ्ते तक चलने वाले 'जॉय ऑफ गिवींग वीक' का आयोजन किया जिसे बाद में दान उत्सव का नाम दिया गया।

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इस कैंपेन के दौरान लोगों ने अपने घरों से लेकर ऑफिस, स्कूल और कॉलेजों में पुराने और इस्तेमाल में न आने वाले कपड़ों का दान किया। 2014 में संस्‍था ने देश भर के 1000 स्कूलों के एक लाख छात्रों को इस कैंपेन में शामिल किया।

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इस कैंपेन का मकसद बच्चों को साम‌ाजिक परिवर्तन के लिए नए विचारों के बारे में सोचने और उन्हें लागू करने के गुर सिखाना था। संस्‍था ने 2013 में उत्तराखंड बाढ़ में भी लोगों की मदद की।

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फिलहाल अंशु गुप्ता का संगठन गूंज 2014 में कश्मीर में आए बाढ़ प्रभावित लोगों की मदद के लिए राहत फ्लड नाम से अभियान चला रहे हैं जिसके अंतर्गत देश भर से लोगों से सामान इकट्ठा करते हैं और कश्मीर के लोगों तक पहुंचाने का काम करते हैं।
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