दिल्ली पुलिस जेएनयू के दलित शोध छात्र मुथुकृष्णनन जीवानंदम की संदिग्ध मौत को आत्महत्या मान रही है। हालांकि आपको जानकर हैरानी होगी कि जिस जेएनयू में एडमिशन के लिए रजनी क्रिश ने चार साल तक लगातार कोशिश की थी उसी में एडमिशन के 6 महीने बाद ही उसने सुसाइड कर लिया। पढ़िए उसकी दर्दभरी कहानी।
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rajini krish
- फोटो : फेसबुक से
आंध्र प्रदेश की एक छोटी सी जगह सेलम के रहने वाले मुथकृष्णन, रजनीकांत का अभिनय करते थे और दोस्तों के बीच रजनी क्रिश के नाम से ही चर्चित थे। यहां तक उन्होंने फ़ेसबुक पर प्रोफ़ाइल भी इसी नाम से बनाई थी। वो फ़ेसबुक पर 'माना' नाम से एक सीरीज़ में कहानियां लिख रहे थे। इन कहानियों में वो एक दलित छात्र के जीवन संघर्ष को बयान करने की कोशिश कर रहे थे। इस सीरीज़ में किए गए अपने अंतिम पोस्ट में उन्होंने समानता के मुद्दे को उठाया था। उन्होंने लिखा था, "समानता से वंचित करना हर चीज़ से वंचित करना है।"
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- फोटो : सोशल मीडिया
मुथुकृष्णन कृष्णन आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से थे। जेएनयू में दाखिला पाने के लिए उन्होंने काफी मेहनत की थी। दलितों के लिए चलाए जाने वाले संगठनों के साथ भी रजनी कृष जुड़े हुए थे। बताया जा रहा है कि अपने आखिरी दिनों में वो डिप्रेशन से भी पीड़ित थे। उनके 10 मार्च के पोस्ट में उनकी मानसिक स्थिति को साफ तौर पर देखा जा सकता है। उस पोस्ट में उन्होंने लिखा था, "एम. फिल/पीएचडी दाख़िलों में कोई समानता नहीं है, मौखिक परीक्षा में कोई समानता नहीं है।"
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- फोटो : सोशल मीडिया
उन्होंने आगे लिखा कि, "सिर्फ समानता को नकारा जा रहा है। प्रोफ़ेसर सुखदेव थोराट की अनुसंशा को नकारा जा रहा है। एडमिन ब्लॉक में छात्रों के प्रदर्शन को नकारा जा रहा है। वंचित तबके की शिक्षा को नकारा जा रहा है। समानता से वंचित करना हर चीज़ से वंचित करना है।"
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- फोटो : सोशल मीडिया
16 जुलाई को डाली गई रजनी की पोस्ट पढ़कर ये साफ जाना जा सकता है कि उन्होंने जेएनयू पहुंचने के लिए क्या-क्या नहीं किया। यहां तक कि हवाई जहाज को देखकर उनके मन में कैसे खयाल आते थे और कैसे उसमें बैठने की उनकी मंशा पूरी हुई इसका भी जिक्र रजनी ने अपने फेसबुक पोस्ट के जरिए किया है। रजनी ने अपनी पोस्ट में बताया है कि पिछली गर्मियों में उन्होंने कैसे मज़दूर की तरह काम किया। दीवारों पर पेंटिंग की। लोगों से पैसे भी मांगे और चेन्नई से दिल्ली की यात्रा के दौरान पूरे सफर में ट्रेन में कुछ भी नहीं खाया ताकि पैसे बच सकें।
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रजनी एक दलित लड़के की कहानी फेसबुक पर लिख रहे थे। उनकी पहली सीरीज में ही दुख और खुशी का संतुलन था, हास्य था।
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- फोटो : फेसबुक से
जुलाई 2016 में फेसबुक पर किए एक पोस्ट में रजनी ने जेएनयू पहुंचने की अपनी कहानी लिखते हुए बताया था, ये जेएनयू आने का मेरा चौथा साल है। मैंने तीन बार जेएनयू में एमए में दाख़िला लेने के लिए प्रवेश परीक्षा दी। दो बार जेएनयू की एम फिल और पीएचडी की परीक्षा दी। दो बार इंटरव्यू में शामिल हुआ।
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वो आगे लिखते हैं, 'आप जानते हैं.... पहली दो बार मैंने अंग्रेज़ी अच्छे से नहीं सीखी। लेकिन मैंने कोशिश की क्योंकि मैं हौसला नहीं हारना चाहता था। हर साल जेएनयू पहुंचने के लिए मैंने छोटे-छोटे काम किए, पैसा बचाया, कभी ट्रेन में खाना नहीं खाया। पहली दो बार में तमिलनाडु से आया और अंतिम दो बार हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी से।'
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वे लिखते हैं, "हर साल लोग मुझे दुआ देते थे कि इस साल तुम्हारा हो जाएगा। मैं कोशिश करता रहा क्योंकि मैं हौसला नहीं हारना चाहता था और मैं हमेशा सोचता था कि मेहनत कभी बेकार नहीं जाती है। मैं हर साल नेहरू की मूर्ति के नीचे बैठता था और नेहरू से कहता था कि नेहरू जी मेरे परिवार के सभी लोग कांग्रेस को वोट देते हैं, आप क्यों नहीं चाहते कि मुझे शिक्षा मिले।"
वे लिखते हैं, "आख़िरी इंटरव्यू में 11 मिनट बाद एक मैडम ने मुझसे कहा कि मैं सरल भाषा बोल रहा हूं। इस बार के साक्षात्कार में मैं आठ मिनट तक बोला और सभी सवालों के जवाब दिए। तीन प्रोफ़ेसरों ने मुझसे कहा कि मैंने अच्छे जवाब दिए हैं। मैं सेलम ज़िले से जेएनयू में चयनित होने वाला अकेला छात्र हूं।" इस पोस्ट में रजनी ने लिखा, "ये पल मेरे लिए ऐतिहासिक है। मैं किताब लिखूंगा- फ्रॉम जंकेट टू जेएनयू।"