बवाना विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव परिणाम से दिल्ली सरकार के अस्तित्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और न ही दिल्ली विधानसभा के परिदृश्य में परिवर्तन होगा। मगर इस चुनाव परिणाम से भाजपा को एक के बाद एक करके झटका मिला है।
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इन मोर्चों पर भाजपा ने की गलती
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भाजपा को तीन माह के दौरान सोमवार को दूसरी बार विपक्षी दलों से करारा झटका मिला है। दरअसल भाजपा को अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करना और अतिउत्साह होना महंगा पड़ गया।
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तीनों नगर निगम चुनाव में भारी जीत के बाद भाजपा के राष्ट्रीय स्तर से लेकर प्रदेश स्तर के नेताओं के जमीन पर पैर नहीं थे और वह नकारात्मक राजनीति करने के साथ-साथ पार्टी के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करने लग गए।
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बवाना विस उपचुनाव के टिकट मसले पर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने इलाके नेताओं एवं कार्यकर्ताओं की एक नहीं सुनी थी। इसके विरोध में भाजपा के पूर्व विधायक गुगन सिंह एवं पूर्व पार्षद नारायण सिंह ने पार्टी छोड़कर आम आदमी पाटी़ का दामन थाम लिया।
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खास बात यह है इन दोनों के प्रभाव वाले इलाके में भाजपा उम्मीदवार वोट के लिए तरस गए और ये दोनों नेता उसकी हार का मुख्य कारण बन गए। दरअसल भाजपाई आप से आए पूर्व विधायक वेद प्रकाश को टिकट देने का कड़ा विरोध कर रहे थे।
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मगर पार्टी के अधिकतर आला नेता वेद प्रकाश को ही टिकट देने पर अड़े रहे और उन्होंने इलाके के नेताओं की परवाह नहीं की और स्थायीय सांसद के बजाए दूसरे इलाके के सांसद को चुनाव की कमान सौंप दी।
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भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह के सांसद बेटे प्रवेश वर्मा को बवाना चुनाव का प्रभारी बना दिया। मगर वह भी जाट बहुल बवाना इलाके में पार्टी की नैया पार कराने में नाकाम रहे।
इससे पहले तीनों नगर निगम चुनाव के करीब एक माह बाद ही मई माह में भाजपा को दो नगर निगम के दो वार्डों के चुनाव में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा था।
पूर्वी दिल्ली नगर निगम के मौजपुर वार्ड में आम आदमी पार्टी ने जीत हासिल की थी, जबकि उत्तरी दिल्ली नगर निगम के सराय पीपल थला वार्ड में कांग्रेस ने बाजी मारी थी। मौजपुर वार्ड में भाजपा तीसरे स्थान पर रही थी, जबकि सराय पीपल थला वार्ड में भाजपा दूसरे स्थान तक पहुंच सकी, इस वार्ड में उसकी हार का अंतर काफी अधिक रहा था।