wing commander abhinandan family
एमएसएफ की सदस्य रहते हुए वह कुछ ऐसे देशों में गईं जहां सिर्फ एके-47 और हथियारों का राज था। 2005 में आइवरी कोस्ट में किए अपने काम को वह सबसे चुनौतीपूर्ण मानती हैं। उसी साल उन्हें लिबेरिया भी जाना पड़ा जहां सिविल वार के बाद चुनाव होने थे और शांति कायम रखने में काफी जद्दोजहद करनी पड़ रही थी।
डॉ. शोभा को नाइजीरिया के पोर्ट हारकोर्ट भी जाना पड़ा जहां पेट्रोल खनन को लेकर चारों ओर झगड़ा-फसाद और युद्ध जैसा माहौल रहता था। खनन कंपनियों, पेट्रोल चोरों और वहां की जनजातियों के बीच कई स्तर पर संघर्ष चल रहा था। उन्होंने वहां एक इमरजेंसी वार्ड, ब्लड बैंक और इंटेसिव केयर के लिए व्यवस्था कराई।
द्वितीय खाड़ी युद्ध के दौरान इराक के सुलेमानिया में डॉ. शोभा मौत के मुंह में जाते-जाते बचीं जब वह एक फिदायीन हमले से दो-चार हुईं। वहीं इरान में वह अपने मरीजों को प्राणायाम सिखाती थीं ताकि वह अपने दुख से बाहर आ सकें जिसकी वजह से वह काफी पॉपुलर हुईं।
wing commander abhinandan
- फोटो : अमर उजाला
एमएसएफ की सदस्य रहते हुए वह इरान-इराक बॉर्डर पर मेडिकल डायरेक्टर भी रहीं। इस वजह से वह पर्शिया की सभ्यता से वाकिफ हुईं और इरानी सभ्यता से प्रभावित होकर उसे अपनी जिंदगी में भी अपनाया। उन्हें हैरानी होती थी कि कैसे इराक से 11 साल से युद्ध करते हुए भी इरानी यही सोचते हैं कि आम इराकी नागरिक भी एक खराब शासक की वजह से ही युद्ध झेलने को मजबूर हैं। 2009 में पापुआ न्यू गिनी में मेडिकल कॉर्डिनेटर रहते हुए उन्होंने तीन बड़े प्रोजेक्ट को संभाला। वह थे सर्जिकल, यौन हिंसा और एचआईवी प्रोजेक्ट। वहां महिलाओं का अक्सर दुष्कर्म होता था लेकिन उपचार नहीं मिलता था जिससे वह एचआईवी की शिकार हो जाती थीं। उन्होंने महिलाओं को इसी परेशानी से बचाने के लिए प्रोजेक्ट चलाए।
पापुआ न्यू गिनी में ही उन्हें उन जनजातियों से दो-चार होने का मौका मिला जो अब भी घास की स्कर्ट पहनते हैं और चिड़ियों के पंखों की हैट लगाते हैं। बिना कुछ सोचे सुअर, जमीन और महिला के लिए इंसान को भी काट डालते हैं। पापुआ जीनिया के बाद वह लाओस में रहीं। यहां उन्होंने चार पहिया वाहन में 1800 किलोमीटर ड्राइव किया, जहां कोई सड़क नहीं थी। इस दौरान उन्होंने देखा कि विश्व बैंक और एशियन डेवलपमेंट बैंक की मौजूदगी के बावजूद कई एरिया ऐसे थे जहां स्वास्थ्य सेवा न के बराबर थी।
लेकिन इस सबमें से जो उनका सबसे बड़ा मिशन था वह हैती में था। जब करीब 3 लाख लोगों की मौत हो गई और उतने ही लोग हैती में 2010 में आए भूकंप में घायल हो गए। इस दौरान डॉ. शोभा ने उनकी स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराई। अभिनंदन की मां ने एक पत्नी की भूमिका भी बखूबी निभाई। एक बार उन्होंने यूएन द्वारा त्रिनिदाद और टोबैगो में मिल रहे एनेस्थेटिक्स को ट्रेनिंग देने के काम को मना कर दिया क्योंकि उन्हें लगा था कि एक सीनियर वायुसैनिक की पत्नी होने के तौर पर पेरिस में डिप्लोमेटिक मिशन पर जाना उनके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है।
(खबर साभारः नॉर्थईस्ट नॉउ के लिए वायु सेना के रिटायर्ड फाइटर पायलट ग्रुप कैप्टन तरुण कुमार सिंघा द्वारा लिखित आर्टिकल से)