ये कोई फिल्म की कहानी नहीं बल्कि असल जिंदगी के संघर्ष की कहानी है। 1952 जन्म लेने वाले एक शख्स की जिसने पैसा इकट्ठा किया खुद की किताब लिखी और प्रकाशित की और आज वो शख्स 24 बेस्ट सेलिंग बुक्स को लिखने वाला लेखक है। हम जिस कहानी को बता रहे हैं उस कहानी के हीरो हैं साहित्यकार लक्ष्मण राव। मातृ भाषा मराठी और किताबें लिख डाली हिंदी में। इनकी कहानी बेहद दिलचस्प और हैरान करने वाली है अगर नहीं जानते हैं आगे की तस्वीरों में जरूर पढ़े इनके संघर्ष की कहानी।
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कैसे इस शख्स ने चाय बनाते-बनाते बदल डाली अपनी जिंदगी
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लक्ष्मण राव वैसे तो महाराष्ट्र के अमरावती जिले के रहने वाले हैं, लेकिन दिल्ली में विष्णु दिंगबर मार्ग से इन्होंने चाय बीड़ी बेंचने का काम शुरू किया।
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वक्त बीतता गया और अपने सपनों को चाय के सहारे ही लक्ष्मण राव ने पूरा कर लिया। वक्त चलता रहा और वक्त के पहिए का साथ लक्ष्मण राव ने नहीं छोड़ा।
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कई सम्मान इस चाय बेंचने वाले इस शख्स ने अपनी लेखनी के दम पर ही इकट्ठे किए हैं।
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पुराने दिनों को जब लक्ष्मण राव याद करते हैं तो कहते हैं कि जब पैसे घर में आने लगे तो पत्नी ने समर्थन देना शुरू किया कि जो हम कर रहे हैं वो सही है।
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पहले मैं गुलशन नंदा जी की पुस्तकें पढ़ता था उनसे मैने काफी ज्यादा हिंदी सीखी। जबकि मेरी मातृ भाषा मराठी है मैं मराठी व्यक्ति हूं।
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राव कहते हैं कि मैं हिंदी में ही लिखता रहा हैं हिंदी में आज मैं चौबीस पुस्तकें लिख चुका हूं।
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अपने प्रसिद्ध नॉवल रामदास के बारे में लक्ष्मण कहते हैं कि ये 1963 की बात हैं जब हमारे गांव का एक लड़का था वो अपने मामा के गांव जा रहा था। रास्ते में एक नदी पड़ती है उसने उसमें छलांग लगाई और डूब कर मर गया।
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वो छोटी सी घटना मेरे दिमाग में थी और मैने उसपर एक उपन्यास लिखा, और वो छपा भी। रामदास स्कूल कॉलेज में खूब पढ़ा गया और ये टॉप सेलिंग बुक्स में शामिल हुआ।
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ये घटना ही मुझे लेखक बनने के लिए प्रेरित करती रही, और मुझे लगा कि मैं लेखक बनूंगा।
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जब मैं स्कूल में था तो विवेकानंद या गांधी जी के बारे में लिखता था। आज भी ज्यादातर साहित्यकारों का मेरे प्रति नकारात्मक नजरिया रहा है।
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वो कहते हैं कि वो चायवाला है इस वजह से उसकी किताब छपती है। इसलिए उसके बारे में अखबारों और टीवी पर आता रहता है। पर चायवाले की किताबें किसी ने पढ़ी नहीं।
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मैं जो लिखता हूं वो सरल सत्य घटनाओं पर लिखता हूं यथार्थ। और दूसरी बात मेरी किताबों में शुद्ध हिंदी होती है।
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नई दिल्ली आरटीओ के पास पान बीड़ी सिगरेट बेंचता था। मैने पैसे इकट्ठा किए और पहली किताब 1979 में प्रकाशित की।
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नके किताबें बेंचने का तरीका भी बेहद अलग है बताते हैं कि मेरी पुस्तक जैसे ही प्रेस से छपकर आती है मैं यहां रख देता हूं, लोगों को बता देता हूं कि मेरी किताब आ गई है।
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मेरे फेसबुक पर 5929 फेसबुक पेज लाइक्स हैं मैं वहां अपनी नई किताब के बारे में बताता हूं। और यहां अपने ग्राहकों को मैं बताता रहता हूं जिनकी जैसी डिमांड होती है किताब वैसे-वैसे बिकती रहती है।
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एक ई-बुक्स बेंचने वाली कंपनी है वहां से मेरी कुछ किताबें बिक जाती हैं और कुछ किताबें यहां से बिक जाती हैं।
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मेरा उद्देश्य तो साहित्यकार बनना ही था। इसके लिए मुझे बहुत कुछ छोड़ना पड़ा। साहित्यकार हैं तो घर में एयकंडीशनर नही है रात दिन अध्ययन हैं संघर्ष है।
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ये पूरा संघर्ष मुझे करना पड़ा। मेरी जिंदगी में इतनी सारी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं ये मेरी बहुत बड़ी उपलब्धि है।
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मैं सड़क पर बैठा हूं चाय बेंच रहा हूं ये मेरी जिंदगी का हिस्सा है।
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जो मैं कर रहा था आज उसका प्रतिफल मुझे मिल रहा है। मेरे लिए ये बहुत बड़ी उपलब्धि है कि राष्ट्रपति कार्यालय से बुलाकर सम्मानित करना।
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बकौल लक्ष्मण राव दिल्ली यूनिवर्सिटी से उन्होंने अपना ग्रेजुएशन पूरा किया। और अब उसके बाद इग्नू से एमए हिन्दी।
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लक्ष्मण राव कहते हैं कि मैने मजदूरी की, खेतों में काम किया और फिर बाद में 40 रूपए अपने पिता से लेकर घर छोड़ दिया।
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1975 में मैं दिल्ली आया। उसके बाद तीन दिन तक एक धर्मशाला में रूका। मुझे एक नौकरी की जरूरत थी, लेकिन मुझे नहीं मिली।
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दो साल मैने वेटर का काम किया और फिर 1977 में खुद की एक पान बीड़ी की दुकान खोल ली, जो कि बाद में एक चाय की दुकान के रूप में बदल गई।
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37 से ज्यादा सम्मान पाने वाले लक्ष्मण राव बहुत कुछ बताते हैं और बहुत कुछ छूट जाता है, लेकिन उनकी किताबें और उनको मिले सम्मान पूरी कहानी बयां कर देते हैं।
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मैं अपनी किताबें पूरे देश में बेंचना चाहता हूं। जितना हो सकता है आज भी किताबें पढता हूं।