आज विश्व अल्जाइमर दिवस है यानी याददाश्त भूलने वाली बीमारी का दिन। शायद आपको सुनकर थोड़ा अजीब लगे, लेकिन सच यही है कि बीफ के सेवन से याददाश्त कम हो सकती है। डॉक्टरों का मानना है कि रेड मीट के सेवन से डिमेंशिया जैसी बीमारी की आशंका बढ़ जाती है। चूंकि रेड मीट में बीफ और मटन दोनों ही आता है, इसलिए डॉक्टर इससे दूरी बनाने की सलाह दे रहे हैं।
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एम्स के न्यूरोलॉजी विभाग की प्रोफेसर डॉ. मंजरी त्रिपाठी ने बताया कि हमारे देश में हर साल डिमेंशिया से पीड़ित मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इसके प्रति जागरूकता लाने के लिए डॉ. त्रिपाठी ने व्यवहार में बदलाव और खानपान इन दो को मुख्य बताया है। उनके मुताबिक, अगर किसी व्यक्ति की दिनचर्या में बदलाव हो रहा है, तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ठीक इसी तरह रेड मीट से दूरी बनानी चाहिए, जबकि चिकन और मछली जैसे सफेद मीट का सेवन किया जा सकता है। हल्दी भी काफी हद तक डिमेंशिया से बचाव करती है।
गौरतलब है कि हमारे देश में डिमेंशिया जैसी मानसिक बीमारी से परेशान मरीजों की संख्या 40 लाख से ऊपर है। आमतौर पर इस बीमारी की उम्र 60 वर्ष से ऊपर बताई जाती है, लेकिन बिगड़ती जीवनशैली युवाओं को भी इसकी जद में ला रही है।
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बुधवार को अल्जाइमर एंड रिलेटेड डिसऑर्डर सोसायटी ऑफ इंडिया ने एक कार्यक्रम भी आयोजित किया, जिसमें इससे जुड़े डॉक्टरों ने इस गंभीर बीमारी के प्रति जागरूकता आना जरूरी बताया। दिल्ली की बात करें तो यहां डिमेंशिया को लेकर गोविंदपुरी में संचालित एकमात्र डे केयर सेंटर इसी सोसायटी का है। कार्यक्रम के दौरान दिल्ली चैप्टर के पूर्व निदेशक कर्नल वीके खन्ना ने सेंटर से जुड़ी कई अहम जानकारियां साझा कीं।
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मरीज के व्यवहार पर रखें नजर
एम्स के न्यूरोलॉजी विभाग की प्रोफेसर डॉ. मंजरी त्रिपाठी बताती हैं कि डिमेंशिया को रोका जा सकता है, खत्म नहीं किया जा सकता। जो मरीज इसकी चपेट में होता है, वह कभी लक्षणों को नहीं समझ सकता, इसलिए उसके परिजनों के लिए जरूरी है कि वे मरीज के व्यवहार पर नजर रखें। अक्सर वृद्धावस्था में याददाश्त कमजोर होती है, लेकिन यह सोचकर इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
मधुमेह मरीजों को ज्यादा दिक्कत
साउथ एशियन फेडरेशन ऑफ एंडोक्रायन सोसायटी के उपाध्यक्ष डॉ. संजय कालड़ा बताते हैं कि जिन मरीजों को मधुमेह की शिकायत है, उनमें अल्जाइमर रोग होने की आशंका ज्यादा होती है। इस रोग को अब टाइप-3 डायबिटीज भी कहा जाता है। वे बताते हैं कि दवाओं से इन मरीजों को बड़ी राहत नहीं मिल पाती है। इसका असर कुछ वक्त के लिए ही होता है। मरीजों को इस बीमारी से राहत शारीरिक गतिविधियां या व्यायाम से मिलती है।