गाजियाबाद के मुरादनगर में श्मशान घाट में पलक झपकते ही मंजर बदल गया था। लोग जयराम के अंतिम संस्कार के बाद उनकी आत्मा की शांति केलिए प्रार्थना कर रहे थे। इसी बीच छत गिरने से कई जिंदगी हमेशा के लिए खामोश हो गई। वहां मौजूद प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि गलियारे की छत गिरते ही भगदड़ मच गई थी तो वहीं मलबे केनीचे से बचाओ-बचाओ की आवाजें आने लगी थीं।
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गाजियाबाद हादसा
- फोटो : अमर उजाला
कोई पत्थर केनीचे छटपटा रहा था तो कोई पिता को आवाज लगा रहा था। जो बाल-बाल बच गए थे वह चिल्ला रहे थे-मेरे दादा दबे हुए हैं, उन्हें निकाल लो, नहीं तो वह मर जाएंगे। रविवार को मुरादनगर के बंबा श्मशान घाट में हुए हादसे के दौरान वहां मौजूद रहे योगेंद्र सिंह ने बताया कि वह भयावह मंजर कभी नहीं भूलने वाला है। लोग जिंदगी की भीख मांग रहे थे।
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गाजियाबाद हादसा
- फोटो : अमर उजाला
कई लोग आधे लिंटर के नीचे दबे हुए थे और छटपटा रहे थे। वह बार-बार एक ही आवाज दे रहे थे भैया मुझे बचा लो, मैं मर जाऊंगा। मुझे जल्दी से निकाल लो। उनमें से तीन लोगों को जिंदा निकाला। योगेंद्र ने कहा कि जो जिस पोजिशन में था, उसी में रह गया। कितना दर्दनाक मंजर था ये बताने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। भगवान किसी को जीवन में ऐसी घटना न दिखाए।
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मुरादनगर हादसा
- फोटो : अमर उजाला
एक और प्रत्यक्षदर्शी रवि ने बताया कि घटना केबाद मौके पर पहुंचने वाले वह दूसरे व्यक्ति थे। उन्होंने बताया कि लिंटर केनीचे 45 से 50 लोग दबे हुए थे। उसमें से केवल 7-8 लोगों की ही बचाने केलिए आवाज आ रही थी। मलबे में दबे लोगों में किसी की गर्दन शरीर केअंदर घुस गई थी तो किसी का आधा शरीर ही दिखाई दे रहा था। लोगों की तड़प को देखा नहीं जा रहा था।
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मलबे के नीचे दबे लोग
- फोटो : अमर उजाला
जितने को निकाल सकते थे, निकाला। एक व्यक्ति के सिर के अंदर चार सरिया घुसकर दूसरी साइड में पार निकली हुई थीं। ऐसा मंजर कभी नहीं देखा। रात को नींद भी नहीं आ रही है। बस, वही सीन घूमता रहता है। प्रत्यक्षदर्शी गुलशन राजपूत ने बताया कि वह भी कुछ ही मिनट में अपने साथियों के साथ घटना स्थल पर पहुंच गए थे। कुछ लोग लिंटर के ऊपर चढ़े हुए थे और दबे लोगों को निकालने की कोशिश कर रहे थे।
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मुरादनगर हादसा
- फोटो : अमर उजाला
उन लोगों को ऊपर से हटाया और छेनी-हथौड़ी से पत्थर को तोड़कर लोगों को निकालना शुरू किया। जिनको निकाल रहे थे, उनमें से अधिकतर की मौत हो चुकी थी। कुछ ही लोगों में सांस बाकी थी। 15 से अधिक लोग तो श्मशान घाट में ही दम तोड़ गए थे। गुलशन ने कहा कि उस सीन को देखने केबाद रात में नींद आनी भी बंद हो गई है। लोग तड़प रहे थे, हमारे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। वह जिंदगी बचाने के लिए भीख मांग रहे थे और हम उनको निकाल नहीं पा रहे थे। फिर भी जितना प्रयास हुआ उतना किया।
शॉल को बनाया स्ट्रेचर
घटना के दौरान मौजूद लोगों ने बताया कि शव को निकाला जा रहा था तो उनकी स्थिति काफी खराब थी। किसी का हाथ टूटा था तो किसी का पैर। किसी की गर्दन लटकी हुई थी। ऐसी स्थिति में मलबे से निकालने के बाद उनको गाड़ी तक ले जा पाना संभव नहीं हो रहा था तो लोगों से शॉल लेकर उसका स्ट्रेचर बनाया और उससे लोगों को वाहनों तक लेगए।