4. इसके बाद तो दिल्ली सरकार ने उपराज्यपाल के खिलाफ पूरी तरह से मोर्चा खोल दिया। उस वक्त दिल्ली के एलजी नजीब जंग थे। सिर्फ यही नहीं उपमुख्यमंत्री सिसोदिया ने तो इसे चुनी हुई सरकार का तख्तापलट की साजिश तक करार दे दिया। इसके बाद चुनी हुई सरकार की मर्जी के बिना शकुंतला गैमलिन को मुख्य सचिव नियुक्त करने पर मुहर लगाने वाले तत्कालीन सर्विसेज के सचिव अनिंदो मजुमदार को दिल्ली सरकार ने पद से तो हटाया ही उनके दफ्तर के दरवाजे पर ताला तक जड़ दिया।
5. केंद्र सरकार ने मई 2015 में एक नोटिफिकेशन जारी कर ये ऐलान किया था कि अब दिल्ली में सरकार का मतलब उपराज्यपाल हैं। इस नोटिफिकेशन में ये भी लिखा था कि सर्विसेज विभाग चुनी हुई सरकार के अधिकार में नहीं है बल्कि उपराज्यपाल के अधीन होगा।
6. केंद्र के इसी नोटिफिकेशन में ये बात भी थी कि अब दिल्ली सरकार की एंटी करप्शन ब्रांच को उपराज्यपाल के हवाले कर दिया गया है और एसीबी को किसी भी केंद्र सरकार के तहत आने वाले अधिकारी या कर्मचारी पर कार्रवाई ना करने का आदेश दिया।
7. इसके बाद दिल्ली के एलजी ने सर्विसेज विभाग के जरिए आईपीएस मुकेश मीणा को एसीबी का प्रमुख नियुक्त कर दिया और दिल्ली सरकार का एसीबी पर से पूरा नियंत्रण खत्म हो गया।
8. इस तरह से दिल्ली सरकार के हाथ से सभी बड़े अधिकार निकल गए और इसके विरोध में सरकार दिल्ली हाई कोर्ट चली गई और वहीं से दिल्ली सरकार बनाम उपराज्यपाल की कानूनी लड़ाई शुरू हो गयी जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने आज काफी हद तक केजरीवाल के हक में फैसला सुनाया है।