“एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान, नहीं चलेगा- नही चलेगा” देश के अभिन्न अंग जम्मू एवं कश्मीर के विषय में बुलन्द आवाज में ऐसा कहने वाले डॉ. श्यामाप्रसाद मुख़र्जी की मौत आज भी एक रहस्य है। धारणा तो यह भी है कि तात्कालीन सत्ता के खिलाफ जाकर सच बोलने की जुर्रत करने वाले डॉ. मुखर्जी को इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। देश की सरकार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने वाले सख्श डॉ. श्यामाप्रसाद मुख़र्जी का जन्म आज के ही दिन सन 1901 में कोलकाता हाई कोर्ट के ज़ज आशुतोष मुख़र्जी के घर हूआ था। यह तो सभी जानते है परन्तु उनकी मृत्यु किन हालातों में हुई इसकी खबर आज भी आम आवाम को नहीं है, आइए जानते है डॉ. श्यामाप्रसाद मुख़र्जी की मृत्यू का रहस्य।
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sheikh abdullah
- फोटो : सोशल मीडिया
भारत के विभाजन के बाद शेख अबदुल्ला को विवादित राज्य जम्मू एवं कश्मीर का प्रधानमंत्री बनाया गया। उस समय के तात्कालीन इंटेलिजेंस ब्यूरो के प्रमुख बीएन मलिक ने अपनी किताब ‘माई इयर्स विद नेहरू: कश्मीर’ में लिखा है कि शेख अब्दुल्ला चाहते थे कि सारे डोगरा कश्मीर छोड़कर भारत चले जाएं। वह जम्मू एवं कश्मीर को एक स्वतंत्र राज्य बनाना चाहते थे। यह बात और डोगरों पर हो रहा अन्याय डॉ. श्यामाप्रसाद मुख़र्जी से देखा न गया।
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shyama prasad
उस समय भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के प्रावधान के अनुसार कोई भी भारत सरकार से बिना परमिट लिए हुए जम्मू-कश्मीर की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकता। परन्तु डॉ. मुखर्जी इस प्रावधान के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने इस प्रावधान का विरोध करने के लिए तथा डोगरा समुदाय की रक्षा के लिए भारत सरकार से बिना परमिट लिए हुए जम्मू व कश्मीर जाने की योजना बनाई।
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atal bihari vajpayee
- फोटो : सोशल मीडिया
8 मई, 1953 को सुबह 6:30 बजे डॉ. मुखर्जी बिना परमिट लिए हुए दिल्ली रेलवे स्टेशन से पैसेंजर ट्रेन में अपने समर्थकों के साथ सवार होकर पंजाब के रास्ते जम्मू के लिए निकले। अटल बिहारी वाजपेयी, टेकचंद, गुरुदत्त वैध और कुछ पत्रकार भी उनके साथ थे।
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Golden Temple of Amritsar
पंजाब सरकार की योजना थी कि उन्हे गुरदासपुर में गिरफ्तार कर लिया जाए और उन्हें पठानकोट न पहुंचने दिया जाए। परन्तु न उन्हें गुरदासपुर न तो अमृतसर में, न पठानकोट में और न ही रास्ते में कहीं और गिरफ्तार नहीं किया गया।
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- फोटो : अमर उजाला
गुरदासपुर के डिप्टी कमिश्नर ने डॉ. श्यामाप्रसाद मुख़र्जी को बताया कि उनकी सरकार ने उन्हें निर्देश दिया है कि वे उन्हें और उनके सहयोगियों को आगे बढ़ने दें और बिना परमिट के जम्मू व कश्मीर में प्रवेश करने से न रोके। डॉ. मुखर्जी को भारतीय सर्वोच्च न्यायलय के अधिकार-क्षेत्र से बाहर जम्मू व कश्मीर में गिरफ्तार किये जाने की योजना बन चुकी थी।
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स्वर्गीय डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी
- फोटो : File Photo
पंजाब और जम्मू व कश्मीर की सीमा बनाते हुए बीच से बहती रावी नदी के पुल से गिरफ्तार किया गया था। डॉ.मुखर्जी एक बहुत छोटा से मकान में बंदी बनाया गया था, जिसके आस-पास कुछ नहीं था। इस मकान तक पहुंचने के लिए खड़ी सीढियां चढ़नी पड़ती थीं, खासकर उनके ख़राब पैर की वजह से यह और भी मुश्किल हो जाता होगा। इस मकान का सबसे बड़ा कमरा दस फीट लम्बा और ग्यारह फीट चौड़ा था, जिसमे डॉ.मुखर्जी को बंदी बनाया गया था। वहीं किनारे के दो छोटे-छोटे कमरों में उनके साथ बंद गुरुदत्त वैध और टेकचंद को रखा गया था।
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sheikh abdullah
- फोटो : सोशल मीडिया
इस उपजेल में विशेष रूप से बुलाने पर ही कोई डॉक्टर शहर से आ सकता था। बांग्ला भाषा में लिखी उनकी चिट्ठियों की अनुवादक द्वारा जांच कराई जाती थी। शेख अब्दुल्ला ने आदेश दिया था कि डॉ.मुखर्जी को कोई अतिरिक्त सहूलियत तब-तक न दी जाए जबतक शेख का आदेश न हो। यहां तक कि शेख अब्दुल्ला ने उनकी डायरी को जब्त कर लिया जिसे अभी तक लौटाया नहीं गया।
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shyama prasad mukherjee
- फोटो : सोशल मीडिया
22 जून 1953 की सुबह उनकी तबियत अचानक गंभीर हो गई। सूचना मिलने पर जेल अधीक्षक काफी देर से एक टैक्सी (एम्बुलेंस नहीं) लेकर पहुंचे। ऐसी नाजुक हालत में उन्हे चलाकर टैक्सी तक ले जाया गया। उन्हें कोई निजी नर्सिंग होम में नहीं बल्कि राजकीय अस्पताल के स्त्री प्रसूति वॉर्ड में भर्ती कराया गया।
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श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि पर भाजपाइयों ने उन्हें याद किया
डॉ. मुखर्जी की देखभाल करने वाली नर्स ने डॉ.मुखर्जी की बड़ी बेटी सविता और उनके पति बताया कि जब डॉ मुखर्जी सो रहे थे तो डॉक्टर जाते-जाते यह बता कर गया कि, ‘डॉ मुखर्जी जागें तो उन्हें इंजेक्शन दे दिया जाए। कुछ देर बाद जब डॉ.मुख़र्जी जगे तो उस नर्स ने उन्हें वह इंजेक्शन दे दिया। नर्स के अनुसार जैसे ही उसने इंजेक्शन दिया डॉ.मुखर्जी उछल पड़े और पूरी ताकत से चीखे, ‘जल जाता है, हमको जल रहा है।’
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नेहरू
- फोटो : Getty Images
नर्स टेलीफोन पर डॉक्टर से कुछ सलाह कर सके इससे पहले डॉ.मुखर्जी सदा के लिए मौत की नींद सो चुके थे। पंडित नेहरू जो डॉ.मुखर्जी की मृत्यु के दौरान लन्दन यात्रा पर थे उन्होने यात्रा ये लौटकर भी इस मामले में कुछ नहीं बोला।
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Jawaharlal Nehru
4 जुलाई 1953 को डॉ. मुखर्जी की मां जोगमाया देवी ने नेहरू के 30 जून, 1953 के शोक सन्देश के उत्तर पत्र में डॉ. मुखर्जी की मौत की जांच की मांग की। जवाब में पंडित नेहरू ने प्यारी बातों से भरा खत भेजा और जांच की मांग को खारिज कर दिया।
जवाहर लाल नेहरु और महात्मा गांधी
- फोटो : सोशल मीडिया
नेताजी सुभाषचंद्र बोस के गायब होने की जांच करने के लिए तीन कमीशन, महात्मा गांधी की हत्या की जांच के लिए कपूर कमीशन, राजीव गांधी की हत्या की जांच करने के लिए दो कमीशन बनाए गए थे। तो ऐसी क्या मजबूरी थी पंडित नेहरू के सामने जो इस मामले की जांच की जरूरत नहीं समझी गई।