डॉ. कलाम ने कहा कि वैसे तो रॉकेट लॉन्च करने का निर्णय उनका था और यह मेरा निर्णय था कि कम्प्यूटर की बात न मानकर रॉकेट लॉन्च किया जाए। 'मैंने पहली बार असफलता देखी थी...और असफलता को कैसे मैनेज किया जाता है? सफलता का प्रबंधन तो मैं कर सकता था लेकिन असफलता का प्रबंधन कैसे करता?'
इसके बाद डॉ. कलाम ने आगे बताया कि कैसे तत्कालीन इसरो चीफ सतीश धवन ने उन्हें लेकर एक प्रेस कांफ्रेंस की वो भी बिना आलोचना के भय के। कलाम ने बताया कि सतीश धवन ने उस वक्त प्रेस कांफ्रेंस में कहा था, 'प्रिय मित्रों, आज हम असफल हो गए। मैं अपने टेक्नोलॉजिस्ट, अपने वैज्ञानिकों, अपने स्टाफ का समर्थन करता हूं ताकि अगले साल ये सफल हो जाएं।'
कलाम ने आगे कहा, 'सतीश धवन ने मिशन फेल होने का सारा दोष अपने ऊपर ले लिया और ये भरोसा दिलाया कि अगले साल हम सफल होंगे क्योंकि उनकी टीम बहुत अच्छी है।' डॉ. कलाम ने उस साल को याद करते हुए आगे कहा कि, 'अगले साल 18 जुलाई 1980 को उसी टीम ने जिसकी अगुवाई डॉ. कलाम कर रहे थे ने सफलतापूर्वक रोहिणी RS-1 को ऑर्बिट में स्थापित किया।' मिशन सफल होने के बाद धवन ने डॉ. कलाम को प्रेस कांफ्रेंस करने के लिए कहा।
इस बात को याद करते हुए डॉ. कलाम ने लोगों को बताया था कि, वो दिन मेरी जिंदगी की बहुत बड़ी सीख थी। जब असफलता मिलती है तो संस्था का लीडर उसकी जिम्मेदारी लेता है। जब सफलता आई तो उन्होंने उसे अपनी टीम को दे दिया। यह सबसे बेहतरीन प्रबंधन का पाठ था जो मैंने किसी किताब से नहीं सीखा बल्कि ये मैंने अपने अनुभव से सीखा।