दिल्ली के व्यस्ततम इलाके कनॉट प्लेस के नजदीक बनी अग्रसेन की बावली फिल्म पीके के एक सीन की वजह से चर्चा में आई थी। लेकिन इससे जुड़े कई और किस्से भी लोगों को अपनी ओर खींचते हैं।
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अग्रसेन की बावली
- फोटो : टीम डिजिटल/अमर उजाला
बावली सरकार के संरक्षित पुरातात्विक स्थलों में से एक है जिसमें 105 सीढ़ियां हैं। बताया जाता है कि 14वीं शताब्दी में महाराजा अग्रसेन ने इसे बनवाया था। सन 2012 में भारतीय डाक ने इस बावली पर डाक टिकट भी जारी किया।
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अग्रसेन की बावली
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1958 में इसे भारत सरकार ने संरक्षित स्थल की सूची में शामिल कर लिया। सूत्र बताते हैं कि भारत सरकार द्वारा संरक्षित ये बावली देश की 10 सबसे बड़ी डरावनी जगहों में शुमार है।
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अग्रसेन की बावली
- फोटो : टीम डिजिटल/अमर उजाला
लाल बलुआ पत्थर से बनी इस बावली को देखने आज भले ही लोगों की भीड़ जुटती हो, लेकिन ये बावली अपनी भुतहा कथाओं की वजह से लोगों में डर का कारण भी बनी थी।
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अग्रसेन की बावली
- फोटो : टीम डिजिटल/अमर उजाला
लोगों का कहना है कि अगर आप भुतहा कथाओं में विश्वास करते हैं तो इस बावली की सीढ़ियां उतरते वक्त आपको डर का एहसास हो सकता है।
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अग्रसेन की बावली
- फोटो : टीम डिजिटल/अमर उजाला
बावली की स्थापत्य शैली की बात करें तो ये उत्तरकालीन तुग़लक़ तथा लोदी काल से मेल खाती है। लोगों का मानना है कि कि इस वक्त गुलजार रहने वाले इस बावली का पानी एक वक्त में काला था।
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अग्रसेन की बावली
- फोटो : टीम डिजिटल/अमर उजाला
बावली का काला पानी लोगों को आवाज देकर अपनी मदद के लिए बुलाता और जीवन बलिदान करने को कहता था। जिसकी वजह से यहां कई लोगों के आत्महत्या करने की कथा भी प्रचलित है।
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- फोटो : टीम डिजिटल/अमर उजाला
लोग ये भी बताते हैं कि यहां आने पर ऐसा लगता है कि कोई आपका पीछा कर रहा है। अगर कोई तेज चलता है तो पीछा करने वाला भी तेज कदमों से आता हुआ महसूस होता है।