आज चाहे हम चाइना को लेकर कितनी भी बातें कर लें, जीत के कितने भी दावे कर लें। लेकिन सच्चाई तो यह है कि जंग के मैदान में भारत को 1962 में उसने मात दे रखी है।
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वहीं जब बात पाकिस्तान की आती है तो हम उन्हें 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में मात दे चुके हैं। आज जब हम 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की बात करतें हैं तो UPA की तरफ से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार व लोकसभा की पूर्व स्पीकर मीरा कुमार के पिता की याद आना स्वाभाविक है।
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असल में भारत की आजादी के आंदोलन में जब भी किसी क्रांतिकारी राजनेता का नाम लिया जाएगा उस पंक्ति में बाबू जगजीवन राम पहली पंक्ति में होंगे। बाबू जगजीवन राम को हम बाबूजी के नाम से भी जानते हैं। आज भी जब हम 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की बात करतें हैं तो बाबुजी कि याद आना स्वाभाविक है।
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उन्होनें एक सफल रक्षा मंत्री के तौर पर 1971 के युद्ध में पाकिस्तान को बुरी तरह परास्त करने में बड़ी भूमिका निभाई थी। वही बाबू जगजीवन राम की आज पुण्यतिथि है। एक सफल रक्षा मंत्री जो कि दो बार प्रधानमंत्री बन सकते थे।
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दलितों से भेदभाव के विरोध से ही हो गइ थी राजनितिक जीवन-यात्रा कि शुरुआत: दलित समुदाय से होने के कारण उनको बचपन से ही सामाजिक भेदभाव और छुआछूत का शिकार होना पड़ा था। बिहार के आरा के जिस स्कूल में बाबू जगजीवन राम पढ़ते थे उस स्कूल में हिंदू और मुसलमान छात्रों के लिए पीने के पानी के अलग-अलग मटके रखे जाते थे। दलित समुदाय के छात्रों ने हिंदू छात्रों के लिए रखे मटके में से पानी पिने पर कथित ऊंची जाति के छात्रों ने जमकर विरोध किया था। उक्त विरोध के बाद स्कूल के प्रिंसिपल ने दलितों के लिए एक और मटका रखवा दिया। छात्र जगजीवन राम ने दलितों के लिए रखे मटके को फोड़कर अपना विरोध प्रकट किया। अंत में प्रिंसिपल ने तीसरा मटका न रखने का निर्णय लिया। स्कूल की इस घटना ने बाबू जगजीवन राम के राजनीतिक जीवन की दिशा तय कर दी। बाबू जगजीवन राम के संसदीय जीवन का इतिहास 50 साल का रहा है, जो कि अपने आप में एक विश्व कीर्तिमान है।
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हिंदू महासभा से था बाबूजी का नाता: बाबूजी के पिताजी ब्रिटिश आर्मी में थे। ब्रिटिश आर्मी से रिटायर होने के बाद वह शिव नारायणी संप्रदाय के महंत हो गए। बाबू जगजीवन राम भी हिंदू महासभा के सदस्य थे। हिंदू महासभा के माध्यम से बाबूजी ने छुआछूत और सामाजिक भेदभाव को खत्म करने का अभुत्वपुर्व प्रयास किया था।
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दो बार प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए: 26 जून, 1975 को देश में इमरजेंसी लगाए जाने के बाद कुछ महीनों तक इंदिरा गांधी और जगजीवन राम के रिश्ते सामान्य रहे, लेकिन सरकार और पार्टी से जुड़े कई निर्णयों पर दोनों के बीच दूरियां बढ़ने लगीं। 1977 में आपातकाल हटने के बाद जगजीवन राम ने हेमवती नंदन बहुगुणा के साथ मिलकर कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी नाम से नई पार्टी का गठन कर लिया। बाद में जयप्रकाश नारायण के कहने पर जनता पार्टी के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ा।
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जनता पार्टी की ऐतिहासीक जीत के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री पद पर दावा पेश किया, लेकिन मोरारजी देसाई के सामने उनका दावा टिक नहीं पाया। उसके बाद वो मोरारजी के शपथ कार्यक्रम में नहीं गए। फिर जयप्रकाश नारायण के अनुरोध पर वो मोरारजी कैबिनेट में शामिल हुए। फिर जब 1979 में मोरारजी की सरकार दोहरी सदस्यता के मामले पर गिर गई तो एक बार फिर चौधरी चरण सिंह और बाबू जगजीवन राम के बीच राजनीतिक युद्ध हुआ। इंदिरा गांधी चाहती थीं कि युवा तुर्क चंद्रशेखर यह जिम्मेदारी लें कि जगजीवन राम उनके हितों के खिलाफ कुछ नहीं करेंगे तो वो प्रधानमंत्री बन सकते हैं।
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जनता पार्टी संसदीय दल में बहुमत के बावजूद राष्ट्रपति संजीव रेड्डी ने बाबूजी को शपथ नहीं दिलाई, इस तरह दूसरी बार बाबू जगजीवन राम प्रधानमंत्री पद की लड़ाई हार गए। 1980 में इंदिरा गांधी के दोबारा सत्ता में लौटने के बाद बाबूजी ने बहुत कोशिश की कि फिर से कांग्रेस में शामिल हो जाएं, लेकिन इंदिरा गांधी ने उनको माफ नहीं किया।
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बाबू जगजीवन राम का आपत्तिजनक बयान: 1968 में कृषि मंत्री के तौर पर बाबूजी ने लोकसभा में बयान दिया था कि वैदिक काल में ब्राह्मण भी गोमांस खाते थे। तब शंकराचार्य जी ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई कि जगजीवन राम का बयान आपत्तिजनक है, इसलिए इन्हें लोकसभा की कार्रवाई से बाहर किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा स्पीकर नीलम संजीव रेड्डी को तलब किया। लोकसभा ने सर्वानुमति से स्पीकर से कहा कि वे सुप्रीम कोर्ट से कह दें कि संसद पर उसका कोई न्यायाधिकार नहीं है। बाद में बाबूजी ने मीडिया के सामने स्पष्ट किया कि उनका मकसद किसी समुदाय की भावना को आहत करना नहीं था। उन्होंने ऋगवेद के श्लोक संस्कृत में सुनाकर साफ किया कि जो कुछ कहा वह गलत नहीं था। बाबूजी को संस्कृत भाषा का अच्छा ज्ञान होने कि वजह से ऐसे किसी भी मामलों में उनकी बातें विरोधी को भी स्वीकार करनी पड़ती थी।
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व्यक्तिगत जीवन: जगजीवन राम का जन्म 5 अप्रैल 1908 को हुआ था। वहीं 6 जुलाई 1986 को बाबूजी सदा के लिए अमर हो गए।
बाबू जगजीवन राम कि दो शादी हुइ थी। उनकी पहली पत्नी कि मृत्यु अगस्त 1933 में एक संक्षिप्त बीमारी के वजह से हो गई थी। उसके बाद उन्होंने कानपुर के एक प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. बीरबल की बेटी इंद्राणी देवी से जून 1935 में शादी की।
दुसरी पत्नी इंद्राणी देवी से उनकें दो बच्चे हैं, सुरेश कुमार और मिरा कुमार। उनकी बेटी मिरा कुमार पांच बार संसद रह चुकी हैं और 2009 में लोकसभा की पहली महिला लोकसभा अध्यक्ष भी बनीं हैं।
वह अपने कार्यकाल में इन राजनितिक पदों पर रहे:
1. वह 30 वर्षों तक कैबिनेट मंत्री रहे जो कि भारत में सबसे लंबे समय तक कैबिनेट मंत्री होने का रिकॉर्ड है (संदर्भ केंदरीय मंत्री परिषद 1947-2004,लोकसभा सचिवालय द्वारा प्रकाशित)
2. केंद्रीय श्रम मंत्री, 1946-1952
3. केंद्रीय संचार मंत्री, 1952-1956
4. केंद्रीय परिवहन और रेल मंत्री, 1956-1962
5. केंद्रीय परिवहन और संचार मंत्री,1962-1963
6. श्रम, रोजगार और पुनर्वास केंद्रीय मंत्री, 1966-19 67
7. केंद्रीय खाद्य और कृषि मंत्री, 1967-1970
8. केंद्रीय रक्षा मंत्री, 1971-1974, 1977-1979
9. केंद्रीय कृषि और सिंचाई मंत्री, 1974-1977