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अलवर मॉब लिंचिंग: मारे गए 'अकबर' का नाम ऐसे पड़ा 'रकबर', इसलिए ले जा रहा था 60 हजार की गाय

Tue, 24 Jul 2018 02:45 PM IST
यूनुस अलवी, अमर उजाला, कोल गांव (मेवात)
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alwar lynching - फोटो : अमर उजाला
कोल गांव से फिरोजपुर झिरका करीब 8 किलोमीटर दूर है। गांव के अधिकतर लोग शहर जाकर घरों या दुग्ध डेरियों पर गाय भैंस का दूध बेचते हैं। मृतक रकबर के पिता सुलेमान भी शुरू से ही दूध बेचने का काम करते हैं। वह बताते हैं कि उनके बेटे का नाम पहले अकबर था लेकिन उन्होंने एक खास वजह से उसका नाम रकबर रख दिया। इसके साथ ये भी बताया कि रकबर आखिर 60 हजार की गायें खरीदकर क्यों ला रहा था।
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alwar lynching - फोटो : अमर उजाला
बकौल सुलेमान, करीब 30 साल पहले फिरोजपुर झिरका में लीला दुग्ध डेयरी पर गाय व भैंस का दूध बेचने जाता था। डेयरी संचालक लीला के बेटे का नाम रकबर था, जिसे सुलेमान बहुत प्यार करता था। इसी दौरान बीवी ने बेटे को जन्म दिया और बीवी ने बेटे का नाम अकबर रखा लेकिन सुलेमान ने लीला के बेटे के प्यार में अपने बेटे अकबर का नाम बदलकर रकबर कर दिया।
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alwar lynching - फोटो : अमर उजाला
जब सुलेमान से पूछा गया कि रकबर के नाम के मायने क्या हैं तो दो टूक जवाब दिया कि मुझे मायने से कुछ नहीं लेना, बस लीला डेरी वाले का लड़का अच्छा लगा जिससे उसने अपने लड़के का नाम भी रकबर कर दिया। गांव में आज भी रकबर को अकबर ही कहते हैं लेकिन उसके सारे कागजातों में उसका नाम रकबर है।

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alwar lynching - फोटो : अमर उजाला
इसलिए 60 हजार में गाय खरीदने गया था अकबर-
राजस्थान के थाना रामगढ़ इलाके से दुधारू गाय लाते वक्त कथित गौरक्षकों द्वारा मौत के घाट उतारे गए मेवात के कोल गांव निवासी रकबर उर्फ अकबर की पत्नी की दुनिया तो मानो थम सी गई है। अकेले सात बच्चों का भरण-पोषण कर पाना मुश्किल हो गया है। रकबर के पास 2 बीघा जमीन है जिसमें उसका परिवार रहता है।
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alwar lynching - फोटो : अमर उजाला
परिजनों का पेट गाय का दूध बेचकर और मजदूरी करके बमुश्किल भर पाता था। दूध-घी ज्यादा हो तो परिवार का गुजारा सही से हो जाएगा, यही सोचकर अकबर राजस्थान के गांव खानपुर से 60 हजार रुपए में दुधारू गाय खरीदकर 20 जुलाई को कोल गांव आ रहा था। रास्ते में कथित गौरक्षकों ने उसकी पिटाई की, जिससे बाद में उसकी मौत हो गई।
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alwar lynching - फोटो : अमर उजाला
अकबर के घर में यूं तो पांच गाय हैं, लेकिन फिलहाल एक ही दूध दे रही है। परिवार के पास खेतीबाड़ी के लिए कोई जमीन नहीं है। मात्र 2 बिस्वा जमीन गांव में रहने के लिए है। जिसमें 10 गुणा 10 फीट का एक कमरा बना है और उसके पास में एक झोपड़ी बनाई हुई है।

मृतक की पत्नी असमीना का कहना है कि पति को गाय लाने पर नहीं बल्कि मुसलमान होने की वजह से मारा गया है। बच्चों के भविष्य को सोचकर व्याकुल असमीना ने कहा कि हत्यारों को फांसी की सजा मिलनी चाहिए। उसके कंधों पर बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी आ गई है। वह मजदूरी नहीं सकती। ऐसे में बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित है।
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alwar lynching - फोटो : अमर उजाला
गोपालकों का गांव है कोल गांव-
मेवात कृषि प्रधान इलाका है। यहां करीब 90 फीसदी आबादी कृषि पर आधारित है। लोग कृषि और मवेशी आधारित काम धंधों जैसे दूध-घी बेचकर अपना घर चलाते हैं। मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर करीब 3 साल पहले गोपालन के लिए मेवात के करीब 100 लोगों को सम्मानित कर चुके हैं। मेवात में आज भी करीब 50 हजार पालतू गाय हैं। अकेले कोल गांव में करीब 200 परिवारों के पास एक हजार से अधिक गाय हैं जिनके सहारे इन परिवारों का चूल्हा जलता है।
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alwar lynching - फोटो : अमर उजाला
कोल गांव के पूर्व सरपंच हरलाल का कहना है कि यहां लोगों का मुख्य व्यवसाय पशुपालन और खेती है। उन्होंने जोर देकर कहा, गांव में कोई भी गोहत्या के लिए गाय नहीं लाता। आज भी गांव के फज्जर, दीनू, सुंदर, कल्लू, कमरू, अमरू सहित सैकड़ों ग्रामीणों के पास दुधारू गाय हैं। कथित गोरक्षकों द्वारा मौत के घाट उतारे गए रकबर उर्फ अकबर के घर में भी 5 गाय हैं, जिनमें से एक दूध दे रही है।
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