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रंग सफेद होने के बाद भी क्यों 'लाल किला' पड़ा नाम, असली नाम भी नहीं जानते होंगे आप

Tue, 07 Aug 2018 05:02 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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जब भी देश की खूबसूरत इमारतों का जिक्र आता है तो लोगों के जेहन में खूबसूरत मीनारों, मजबूत दीवारों और लाल रंग से सजी एक भव्य किले का ख्याल जरूर कौंधता है, वो इमारत जो एक वक्त भारत के स्वर्ण युग की गवाह रही। तो कभी उसने अंग्रेजो की गुलामी भी देखी। उसके बाद देश की आजादी की रोशनी से सराबोर भी हुई। जिसके बुर्ज पर हर साल स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री गर्व से एक मजबूत लोकतांत्रिक देश का ध्वज फहराते हैं। जिसके सामने खड़े हो जाने भर से छाती गर्व से तन जाती है बात उस लाल किले की। 
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आजादी मिलने के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसी किले की प्राचीर से पहली बार देश के नाम संबोधन दिया था। तब से हर साल लाल किले पर ही आजादी का जश्न मनाया जाता है। इस किले का निर्माण पांचवें मुगल बादशाह शाहजहां ने कराया था। साल 2007 में इस किले को यूनेस्को ने विश्व धरोहर की सूची में शामिल कर लिया। लाल किले के बारे में एक बात ज्यादातर लोगों को नहीं पता है, वो ये कि इसका असली रंग लाल नहीं है, बल्कि सफेद है।
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देश में ज्यादातर लोगों को यही लगता है कि लाल किले का असली रंग लाल है। इसी वजह से इसको यह नाम मिला है। हालांकि सच्चाई कुछ और ही है, जब इसका निर्माण हुआ तो इसका ये रंग नहीं था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के मुताबिक इस इमारत के कई हिस्से चूना पत्थर से बनाए गए थे, जिसकी वजह से इसका रंग सफेद था। बताया जाता है कि कुछ समय बाद चूना पत्थर खराब होकर गिरने लगा था, तो अंग्रेजों ने उस पर लाल रंग करा दिया। इसी वजह से बाद में इसे 'लाल किला' कहा जाने लगा। इसका असली नाम किला-ए-मुबारक है। मुगल शासन में शाही परवार के लोग इसे मुबारक किला भी कहते थे।

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1857 की क्रांति के बाद इस पर अंग्रेजों ने अधिकार जमा लिया। दुनिया का सबसे बड़ा कोहिनूर हीरा भी एक वक्त पर इसी इमारत में रखा हुआ था। दरअसल शाहजहां जिस तख्त पर बैठा करते थे ये हीरा उसी में लगा हुआ था। ये सिंहासन सोने से बना था और उस पर बेहद कीमती पत्थर लगे हुए थे। कोहिनूर लगा ये तख्त दीवान-ए-खास में रखा रहता था।
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लाल किले में कई प्रमुख इमारते हैं। जिनमें दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, मोती मस्जिद, हीरा महल, रंग महल, खास महल, हयात बख्श बाग हैं। मुगल काल में आम जनता की फरियाद सुनने के लिए दीवान-ए-आम बनाया गया था। वहीं दीवान-ए-खास में बादशाह अपने मंत्रिमंडल और सभासदों के साथ बैठते थे। किले में बने हमाम के पश्चिम में मोती मस्जिद बनी है। ये औरंगजेब की निजी मस्जिद थी। तीन गुम्बद वाली ये मस्जिद तराशे हुए सफेद संगमरमर से बनी है।
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