25 वर्षीय रोहन घुमक्कड़ कलाकार हैं जो आर्क आई नाम की कंपनी में काम करते हैं और 2014 में अपने ऑफिस प्रोजेक्ट के लिए नेपाल गए थे। वहां उनके ही कंपनी की एक शाखा है जिसका नाम एसएमए है।
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नेपालियों को आशियाने का सहारा दे रहा भारत का ये सितारा
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इस साल अप्रैल में आए भूकंप ने नेपाल के वास्तुशिल्प धरोहर को बुरी तरह तबाह करके रख दिया है। लेकिन अब इनमें से कुछ को दोबारा बनाने की कोशिश की जा रही है और इसमें दिल्ली आर्किटेक्ट रोहन पतनकर अपनी कला से मदद कर रहे हैं।
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रोहन बताते हैं कि यात्रा वृत्तांत लिखने की आदत है और इसलिए वो नेपाल गए थे। नेपाल की अपनी यात्रा पर उन्होंने चित्र बनाया था जो उन्होंने देखा और जो महसूस किया उसे लिखा था।
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रोहन कहते हैं कि उनके नेपाल जाने के 9 महीने बाद जब उन्होंने टीवी पर नेपाल में आए भूकंप के बारे में जाना तो सबसे पहले उन्हें अपने नेपाल के सहकर्मियों की चिंता हुई जो उनके दोस्त भी हैं।
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रोहन बताते हैं कि उन्हें उस वक्त ये एहसास भी नहीं था कि नेपाल में रह रहे उन लोगों से संपर्क करने में भी कई दिन लग जाएंगे। त्रासदी के कई हफ्तों बाद नेपाल में रोहन के सरकर्मी वहां की इमारतों को दोबारा बनाने का काम कर रहे थे तब रोहन ने उन्हें पैसों से मदद करने की सोची।
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तब रोहन को पता चला कि नेपाल में उसके सहकर्मी बेघर हुए लोगों के लिए पत्थरों, लकड़ी और अन्य सामग्रियों से बसेरे बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उस वक्त रोहन ने निश्चय किया कि वो इस काम के लिए फंड जुटाएगा।
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रोहन ने बताया कि फंड जुटाने के लिए उसने एक तरीका सोचा। उसने अपनी नेपाल वाली डायरी के चित्रकारी को हाई-रिजॉल्यूशन में प्रिंट कराकर पोस्टकार्ड पर छपवाए।
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रोहन ने इन पोस्टकार्ड को ऑनलाइन बेचने का सोचा और इसे नाम दिया 'आर्ट फॉर नेपाल।' हर पोस्टकार्ड पर हाथ से स्टैम्प लगा था और उसकी नंबरिंग के साथ ही हस्ताक्षर भी किए गए थे। रोहन कहते हैं कि हर एक पोस्टकार्ड उनकी मां ने पैक किया था और उनके घर से ही उसकी शिपिंग हुई थी।
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इस बेहतरीन प्रयास को देखकर रोहन की ही संस्था से और लोगों ने भी इसमें मदद की। वो कहते हैं कि ये आइडिया एक वॉट्सग्रुप पर चर्चा के बाद निकलकर आया था।
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रोहन बताते हैं कि उनकी आर्किटेक्ट दोस्त लक्ष्मी नायर और सरोजिनी दंतापल्ली ने और भी चित्र बनाए और उन्हें ए5 साइज की नोटबुक पर प्रिंट कराया ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इसे खरीदें और ज्यादा पैसे इकट्ठे हों। इसके बाद तो उन्हें अमेरिका, दुबई और सिंगापुर से भी खरीददार मिल गए।
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जिस दौरान रोहन फंड जुटाने का काम कर रहे थे उसी बीच नेपाल के पनौती गांव जो काठमांडू से दो घंटे की दूरी पर है, में पहला ट्रांजिशनल शेल्टर बनकर तैयार हो गया था।
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रोहन ने अब तक अब कला और ट्रवेल डायरी के बलबूते 1.2 लाख रुपए का फंड जुटा लिया है। ये पैसे नेपाल में चार ट्रांजिशनल शेल्टर बनाने के लिए पर्याप्त हैं। ये शेल्टर आपदा के बाद बनने वाले टेंपोरेरी शेल्टर नहीं है बल्कि कुछ सालों तक चलने वाले हैं ताकि जो परिवार विस्थापित हुए हैं उनकी जिंदगी स्थिर हो सके।