दुनिया के सबसे बड़े कीटों में शुमार ‘एटलस माथ’ बुधवार को ज्योलीकोट में दिखायी दिया। बेहद आकर्षक और प्राकृतिक रूप सौंदर्य के कारण कीट को सामान्यतया तितली समझ लिया जाता है।
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लोगों के लिए कौतूहल बने माथ का जीवन चक्र बदलते पर्यावरणीय परिस्थितियों से संकट में है। बटरफ्लाई रिसर्च सेंटर भीमताल के संस्थापक पीटर स्मैटाचेक बताते हैं कि ‘एटलस माथ’ हिमालय क्षेत्र, भारत के विभिन्न प्रांतों सहित चीन, मलेशिया, इंडोनेशिया सहित दक्षिण एशिया के अन्य कई देशों में पाया जाता है।
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अधिकांशत: जुलाई व अगस्त में दिखायी देने वाला ‘एटलस माथ’ का जीवन चक्र रेशम कीट से मिलता जुलता है। 10 से 12 इंच लंबाई का ये कीट रात्रि में उड़ान भरता है और दिन में पूर्ण विश्राम करता है, विश्राम की स्थिति में ये अपने जीवन यात्रा के लिए ऊर्जा एकत्र करता है।
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सरस्वती विहार के डॉ. मुकुल कांडपाल बताते है कि उत्तराखंड में बांज, उतीस व तुसार प्रजाति के पेड़ों पर इनके जीवन चक्र की बढ़त तेजी के साथ होती है। इस दौरान ये रेशम का भी निर्माण करते हैं। रेशम का निर्माण सिर्फ मादा द्वारा किया जाता है जबकि नर माथ वंश को बढ़ाने का कार्य करता है।
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आकर्षक रंगों और प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर ‘एटलस माथ’ का जीवन चक्र भी बेहद रोचक होता है। अंडा लार्वा और प्यूपा की स्थिति के बाद इसकी जिन्दगी मात्र 5 से 7 दिन ही होती है। प्रदेशीय मौन विशेषज्ञ डॉ. एचसी तिवारी ने बताया कि माथ में भोजन ग्रहण करने के लिए मुंह नहीं होता है।
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प्राकृतिक रूप से प्यूपा की स्थिति में इसके भीतर इतना फैट जमा हो जाता है कि उसी के सहारे यह अपनी उम्र (5 से 7 दिन) को आराम से गुजार लेता है। बदलते पर्यावरण और ग्लोबल वार्मिंग के चलते प्रकृति की इस सुंदर रचना का अस्तित्व भी खतरे में दिखाई दे रहा है।
बढ़ते प्रदूषण और जंगलों में बांज प्रजाति की घटती संख्या से इनके भोजन, प्राकृतिक आवास की उपलब्धता को कम कर रहा है। प्रकृति प्रेमी पुष्कर जोशी का मानना कि प्रकृति के इन विशेष रचनाओं को संरक्षित करने के लिए ठोस योजना बननी चाहिए।