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बचपन में परिवार ने जिन्हें गाने से रोका आज दुनिया उनपर कर रही नाज, ऐसे तय किया पद्मश्री तक का सफर 

Fri, 08 Mar 2019 12:03 PM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
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basanti bisht
महिला दिवस पर हम आपको एक ऐसी महिला की कहानी बता रहे हैं जिन्होंने समाज की रूढ़ियों को तोड़कर ऐसा मुकाम हासिल किया कि आज दुनिया उनपर नाज कर रही है। इतना ही नहीं परिवार जिन्हें बचपन में गाने से रोकता था उसी संगीत में नाम कमाने के लिए उन्हें 2017 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। 
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basanti bisht - फोटो : file photo
हम बात कर रहे हैं उत्तराखंड निवासी 66 साल की पद्मश्री बसंती बिष्ट की। बसंती बिष्ट का जन्म उत्तराखंड के एक सीमांत गांव ल्वाणी में हुआ। यह गांव नंदा देवी राजजात यात्रा के मार्ग पर स्थित है। नंदा देवी को क्षेत्र के लोग अपनी बेटी की तरह पूजते हैं। इसलिए यहां वर्षों से नंदा देवी के जागर गायन की परंपरा विद्यमान है। 
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Basanti Bisht - फोटो : AmarUjala
जागर गायन को मूलत: पुरुषों का कार्य माना जाता था। गांव और पहाड़ में महिलाओं के मंच पर जागर गाने की परंपरा नहीं थी। इसलिए बचपन में जब बसंती ने जागर गाने की अपनी इच्छा जाहिर की तो उनके खुद के परिवार ने उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी।

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Basanti Bisht - फोटो : AmarUjala
बसंती को बचपन से संगीत में रूचि थी लेकिन सामाजिक बेड़ियों के चलते के चलते उनकी यह हसरत पूरी नहीं हो सकी।  लेकिन उन्होंने अपनी ये हसरत शादी के बाद पूरी की। उनके पति रणजीत सिंह ने उन्हें प्रोत्साहित किया। पति ने उन्हें गुनगुनाते हुए सुना तो विधिवत रूप से सीखने की सलाह दी। पहले तो बसंती तैयार नहीं हुई लेकिन पति के जोर देने पर उन्होंने सीखने का फैसला किया। हारमोनियम संभाला और विधिवत रूप से सीखने लगी।
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कार्यक्रम में प्रस्तुति देती बसंती देवी - फोटो : अमर उजाला
उत्तराखण्ड आन्दोलन के समय मुजफ्फरनगर, खटीमा और मसूरी गोलीकांड की पीड़ा को बसंती बिष्ट ने गीत में पिरोया और राज्य आंदोलन में कूद पड़ी। अपने लिखे गीतों के जरिये वह लोगों से राज्य आंदोलन को सशक्त करने का आह्वान करती। राज्य आंदोलन के तमाम मंचों पर वह लोगों के साथ गीत गाती। इससे उन्हें मंच पर खड़े होने का हौसला मिला।
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basanti bisht - फोटो : file photo
40 वर्ष की उम्र में पहली बार बसंती को मंच पर चढ़ने का मौका मिला। उस दौरान राज्य आंदोलन चरम पर था। बसंती ने राजधानी के परेड मैदान भर में गढ़वाल सभा के कार्यक्रम के जरिए मंच पर अपना सफर शुरू किया और उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
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बसंती बिष्ट - फोटो : AmarUjala
आज बसंती देश और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में महिला सशक्तीकरण का संदेश दे रही हैं। बसंती ने सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ा और अपने ही नहीं तमाम महिलाओं के लिए एक मिसाल पेश की। उनका मानना है कि अगर आपके अंदर हुनर है तो उसे जरूर काम में लाएं। 
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