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कानपुर एनकाउंटर: 11 साल पहले सुर्खियों में छाया था देहरादून में हुआ रणबीर एनकाउंटर, 22 गोलियों से छलनी हुआ था शरीर

Sat, 11 Jul 2020 10:03 PM IST
अलका त्यागी कुणाल दरगन, अमर उजाला, हरिद्वार
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- फोटो : फाइल फोटो
कानपुर के इनामी बदमाश विकास दुबे को कथित मुठभेड़ में मार गिराने की खबर के बाद उत्तराखंड के लोगों के मन में देहरादून में 11 साल पहले हुए रणबीर एनकाउंटर की याद ताजा हो गई। उत्तराखंड पुलिस भले ही एनकाउंटर में विश्वास न करती हो, लेकिन विकास दुबे के मामले में यहां के सेवारत और रिटायर्ड पुलिसकर्मी यूपी पुलिस के साथ खड़े नजर आए। उन्होंने सोशल मीडिया पर आलोचनाओं का जवाब दिया तो मुठभेड़ में बदमाश को मार गिराने पर यूपी पुलिस को सलाम करने से भी पीछे नहीं रहे। यह बात अलग है कि वर्ष 2009 में एनकाउंटर के बाद प्रदेश में ठांय-ठांय की गूंज सुनाई नहीं दी है। उस वक्त पोस्टमार्टम रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि रणवीर के शरीर पर चोट के 28 निशान थे, जबकि उसे 22 गोलियां मारी गई थी। 
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- फोटो : फाइल फोटो
हरिद्वार जिले में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अपराधी लंबे अर्से से पुलिस के लिए सिरदर्द बने हैं। मौजूदा समय में भी सुनील राठी, संजीव माहेश्वरी उर्फ जीवा रह रहकर सुर्खियों में आते रहते हैं। इन्हीं के नक्शेकदम पर रुड़की का कुख्यात प्रवीण वाल्मीकि भी चल रहा है। राज्य गठन के बाद हरिद्वार पुलिस और एसओजी ने ताबड़तोड़ मुठभेड़ को अंजाम देकर कई कुख्यातों को मार गिराया, लेकिन वर्ष 2009 के बाद ऐसी कोई मुठभेड़ नहीं हुई, जिसमें कोई अपराधी ढेर हुआ हो। 
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- फोटो : फाइल फोटो
दरअसल, रणबीर एनकाउंटर में इंस्पेक्टर समेत कई पुलिसकर्मियों को सजा के बाद उत्तराखंड पुलिस ने इससे तौबा कर ली थी। वहीं, शुक्रवार को जब खबर मिली कि कानपुर में पांच लाख रुपये के इनामी विकास दुबे को यूपी पुलिस ने कथित मुठभेड़ में मार गिराया है तो कुछ सेवारत और सेवानिवृत्त पुलिसकर्मी सोशल मीडिया पर यूपी पुलिस के साथ खड़े दिखे। उन्होंने बाकायदा मुठभेड़ पर सवाल उठाने वालों को जवाब देकर यूपी पुलिस का बचाव किया।

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- फोटो : फाइल फोटो
राज्य गठन के बाद वर्ष 2008 तक ताबड़तोड़ एनकाउंटर हुए। इस दौरान करीब 32 एनकाउंटरों में 48 अपराधी मारे गए। सूबे के मौजूदा डीजीपी (कानून व्यवस्था) अशोक कुमार के पुलिस कप्तान एवं मौजूदा आईजी अभिनव कुमार के कार्यकाल में सबसे अधिक एनकाउंटर हुए। राज्य गठन से ठीक पहले कुख्यात उदयराज सैनी मारा गया। फिर उसके गैंग के मनोज सैनी, शशि सैनी को पुलिस ने ठिकाने लगाया। यहां से शुरू हुआ एनकाउंटर का सिलसिला वर्ष 2008 तक चला। इस दौरान पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा के साथ ही हरिद्वार जिले के भी कई कुख्यातों को पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया।
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पुलिसकर्मियों के साथ कुख्यात सुनील राठी - फोटो : अमर उजाला
एनकाउंटरों पर विराम लगने के बाद हरिद्वार जिले में अपराधियों का दुस्साहस भी बढ़ा है। वर्ष 2011 में तो रुड़की जेल के डिप्टी जेलर नरेंद्र खंपा को जेल के बाहर ही ताबड़तोड़ फायरिंग कर मौत के घाट उतार दिया गया। इस वारदात को कुख्यात सुनील राठी के इशारे पर अंजाम दिया गया। वर्ष 2014 में रुड़की जेल के गेट पर गैंगवार हुआ। अपराधी चीनू पंडित बच गया, लेकिन उसके तीन परिचितों को गोलियों से भून दिया गया। 
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जीवा - फोटो : फाइल फोटो
इसमें भी सुनील राठी की मुख्य भूमिका सामने आई। हरिद्वार में हुई ट्रेवल्स व्यवसायी चौधरी हरवीर सिंह की हत्या, ट्रेवल्स व्यवसायी एवं बसपा नेता कृष्ण मुरारी शर्मा पर शूटआउट को जीवा के इशारे पर अंजाम दिया गया। कंबल व्यवसायी अमित दीक्षित की हत्या भी जीवा के शूटरों ने भूलवश कर दी। प्रवीण वाल्मीकि ने कई हत्याएं जेल में बैठे बैठे करवाईं। अपराधों का यह सिलसिला अब तक जारी है। 
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