मानसून की आहट के साथ ही नैनीताल के तल्लीताल क्षेत्र से लगा बलियानाला क्षेत्र भूस्खलन के लिहाज से बेहद संवेदनशील हो जाता है। तकरीबन डेढ़ सौ साल से बलियानाला की पहाड़ी दरक रही है। पहाड़ी के ट्रीटमेंट के नाम पर अब तक करोड़ों रुपये खर्च हो चुके हैं, लेकिन नतीजा सिफर है।
इस बार भी इस संवेदनशील पहाड़ी से सटे क्षेत्रों में रह रहे करीब 55 परिवारों को वहां से अन्यत्र शिफ्ट होने संबंधी नोटिस जारी किए जा चुके हैं। स्थायी ट्रीटमेंट तो तब हो जब यह पता चले कि कैसे इस पहाड़ी के भूस्खलन को रोका जाए।
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विडंबना है कि आज तक न तो भू वैज्ञानिक और न ही संबंधित विभाग बलियानाला के मर्ज की दवा खोज पाए हैं। बलियानाला क्षेत्र में भूस्खलन का इतिहास 155 साल पुराना है। हाल के वर्षों में यह अधिक खतरनाक हो गया है। यदि युद्ध स्तर पर इसका उपचार नहीं हुआ तो नैनीताल शहर और झील के लिए यह भूस्खलन बड़ा खतरा साबित हो सकता है। यह पहाड़ी नैनीझील की जड़ में है। इसी पहाड़ी की तलहटी से होकर नैनीझील का अतिरिक्त पानी बाहर निकलता है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 1867 में बलियानाला में सबसे पहले भूस्खलन हुआ था। उसके बाद वर्ष 1889 में हुए भूस्खलन में वीरभट्टी-ज्योलीकोट रोड ध्वस्त हुई। वर्ष 1889 में ही यहां से कैलाखान की ओर भूस्खलन हुआ। 17 अगस्त 1898 के भीषण भूस्खलन में यहां 27 लोगों की जान गई और प्रसिद्ध बियर फैक्ट्री तबाह हो गई। वर्ष 1924 में यहां फिर भारी भूस्खलन हुआ जिसमें एक स्थानीय महिला और दो पर्यटक मारे गए। इस बार यहां स्थित एक रेस्टोरेंट, कुछ दुकानें, पुलिस चेक पोस्ट और राज्यपाल का गैराज जमींदोज हो गए। तब इसकी चपेट में वर्तमान पुलिस लाइन तक का क्षेत्र तक आ गया था।