उत्तराखंड प्रदेश के 15 वर्ष तक के हर 10 बच्चों में से छह की हालत 'नाजुक' है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे वर्ष 2015-16 से यह चिंताजनक तस्वीर उभरकर सामने आई है।
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देवभूमि उत्तराखंड में नवजात बच्चों की हालत बेहद 'नाजुक'
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हर 10 बच्चों में से छह में खून की कमी है। स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के दावों के बीच नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे वर्ष 2015-16 (एनएफएचएस) से यह चिंताजनक तस्वीर उभरकर सामने आई है। सर्वे रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के हर चार में से एक बच्चे का वजन सामान्य से कम है।
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देवभूमि उत्तराखंड में नवजात बच्चों की हालत बेहद 'नाजुक'
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राष्ट्रीय स्तर पर जारी सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों को मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाओं के स्तर में बहुत अधिक सुधार नहीं हुआ है।
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पांच साल से कम आयु के 50 फीसदी से ज्यादा बच्चे खून की कमी की समस्या से पीड़ित हैं। वहीं 15 वर्ष आयु तक औसतन: प्रत्येक दस में से छह बच्चों में खून की कमी है।
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प्रत्येक दस में से तीन बच्चों का शारीरिक विकास ठीक से नहीं हो पाता। ऐसे ज्यादातर मामलों में उम्र के अनुसार उनकी लंबाई नहीं बढ़ती। पांच में से एक बच्चे का वजन उम्र के अनुसार नहीं बढ़ता।
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प्रदेश में टीकाकरण की स्थिति भी बेहतर नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, 12 से 23 माह के केवल 57.7 फीसदी बच्चों का ही पूरा टीकाकरण हो पाता है।
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शिशुओं के स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता और सुविधाओं में भी अधिक इजाफा नहीं हुआ है। प्रत्येक दस में से दो नवजात को ही जन्म के दो दिनों के भीतर स्वास्थ्य जांच की सेवाएं मिलती हैं।
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घर में पैदा होने वाले बच्चों के मामले में यह आंकड़ा इससे भी ज्यादा खराब है। मात्र 2.4 फीसदी बच्चों को ही जन्म के पहले 24 घंटे के अंदर उचित स्वास्थ्य सेवाएं मिलती हैं।
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सर्वेक्षण रिपोर्ट में नवजात शिशुओं में टीकाकरण की कमी और कुपोषण की भयानक तस्वीर सामने आई है। इसके अनुसार प्रदेश में प्रत्येक एक हजार में से 40 शिशु अपना पहला जन्मदिन भी नहीं मना पाते। बीमारी या अन्य कारणों से इनकी मौत हो जाती है।
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क्राई संस्था की क्षेत्रीय निदेशक सोहा मोइत्रा का कहना है कि एनएफएचएस की सर्वेक्षण रिपोर्ट से साफ है कि प्रदेश में टीकाकरण और स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बेहतर नहीं है। इसके लिए टीकाकरण व्यवस्था में अपेक्षित सुधार करना होगा। गर्भवती महिलाओं और एक वर्ष तक के शिशुओं के स्वास्थ्य में सुधार को बेहतर सेवाएं मिलनी चाहिए।