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ऋषिगंगा जल प्रलयः जल विद्युत परियोजनाओं के मामले में केदारनाथ आपदा से नहीं लिया सबक, इसलिए मची तबाही

Mon, 22 Feb 2021 12:29 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal सुधाकर भट्ट , अमर उजाला, देहरादून
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केदारनाथ आपदा - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा से जल विद्युत परियोजनाओं को लेकर सीखे गए सबक अगर अमल में लाए गए होते तो चमोली आपदा के जख्म कुछ कम गहरे हो सकते थे। चमोली जिले की नीति घाटी में ऋषिगंगा और धौली गंगा का ढाल 70 प्रतिशत से भी अधिक है। ऐसे में इन नदियों में अचानक आने वाली बाढ़ की विनाशकारी शक्ति भी अधिक है। इतना होने पर भी केदारनाथ आपदा के बाद राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान की संस्तुतियों की अनदेखी की गई।
 
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चमोली आपदा - फोटो : ANI
इस अनदेखी का ही परिणाम था कि एनटीपीसी की जल विद्युत परियोजना में नुकसान सारी हद पार कर गया। केदारनाथ आपदा के बाद अध्ययन के आधार पर एनआईडीएम ने साफ कहा था कि जल विद्युत परियोजनाओं में सुरंग निर्माण से लेकर अन्य गतिविधियों में निकलने वाले मलबे को नदी के बाढ़ क्षेत्र से दूर ही डंप किया जाए। चमोली की आपदा में यह सामने आया कि ऋषिगंगा और धौली गंगा के बाढ़ क्षेत्र का निर्धारण नहीं किया गया। इसके साथ ही नदी में कुछ किलोमीटर के दायरे में बन रही परियोजनाओं में मलबे को नदी में ही डंप करने से परहेज नहीं किया गया। 
 
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चमोली आपदा - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
माना जा रहा है कि ऋषिगंगा में आई जल प्रलय ने बांध साइट के मलबे से मिलकर निचले तल में बन रही एनटीपीसी की परियोजना को और अधिक नुकसान पहुंचाया। प्रारंभिक आंकलन में यह भी सामने आ रहा है कि ऋषिगंगा परियोजना के निचले हिस्से में अधिक नुकसान हुआ है और इसका कारण इस क्षेत्र में अधिक मलबे का पहुंचना भी है। केदारनाथ आपदा को देखते हुए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (एनआईडीएम) की सिफारिशें की थीं।
 

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चमोली आपदा - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
सिफारिशें...
1. जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण में सुरंग बनाने, विस्फोट आदि से भारी मात्रा में मलबा उत्पन्न होता है। इस मलबे को नदी के बाढ़ क्षेत्र से अलग बनाए गए डंपिंग जोन में डंप किया जाए।
2.निर्माण स्थल पर भू कटाव को कम करने, सुरक्षा दीवार आदि के प्रावधान होने चाहिए। 
3. नदियों के बाढ़ क्षेत्र को चिह्नित किया जाए और इस क्षेत्र में निर्माण कार्य न किए जाएं। जो निर्माण किए गए हैं, उन्हें हटाया जाए। 
4. जल विद्युत परियोजनाओं का आपदा प्रभाव अध्ययन भी किया जाए
5.निर्माण कार्य में विस्फोटकों का प्रयोग नहीं किया जाए
6. खतरे की पूर्व चेतावनी का तंत्र विकसित किया जाए
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केदारनाथ धाम - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
आपदा से सबक लेकर जो किया गया...
1. नदियों के बाढ़ क्षेत्र चिह्नित किए गए और उसकी अधिसूचनाएं भी जारी की गईं। अभी सभी नदियों के लिए यह नहीं हो पाया है। बाढ़ क्षेत्र के निर्माण को अभी हटाया नहीं गया है। 
2. डंपिंग साइट को लेकर अधिसूचनाएं जारी हुईं लेकिन यह सड़क निर्माण तक ही सीमित हैं। जल विद्युत परियोजनाओं में इस मामले की अनदेखी जारी है।
3. खतरे की पूर्व चेतावनी के लिए एक डाप्लर रडार मुक्तेश्वर में स्थापित किया गया जिसने काम करना शुरू कर दिया है। पौड़ी में भी डाप्लर रडार लगाया जा रहा है। इसके अलावा सुरकंडा में भी डाप्लर रडार स्थापित किया जा रहा है। अन्य तंत्र विकसित नहीं किया गया।
4. केदारनाथ में सुरक्षा दीवार बनाई गई है लेकिन जल विद्युत परियोजनाओं के लिए यह काम नहीं किया गया। ऋषि गंगा और तपोवन में इसकी अनदेखी की ही बात सामने आ रही है। 
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केदारनाथ आपदा - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
केदारनाथ की आपदा में यह साबित हो गया था कि जल विद्युत परियोजना भी आपदा की भयावहता को बढ़ाने वाली साबित हो रही हैं। श्रीनगर में ही एनआइडीएम के अध्ययन में सामने आया था कि एसएसबी बाढ़ क्षेत्र में बना है यहां उस समय बन रही परियोजना के सिल्ट से श्रीनगर के निचले क्षेत्र को अधिक नुकसान हुआ।
- अनूप नौटियाल, संस्थापक, सोशल डेवलपमेंट फॉर कम्यूनिटी फाउंडेशन
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