क्या आपको पता है कि उत्तराखंड में बद्रीनाथ धाम के कपाटोद्घाटन के समय रावल को एक अनोखी परंपरा निभानी पड़ती है। यहां तक कि रावल बनाया ही उन्हें जाता है जो ये परंपरा निभा सकें।
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badrinath rawal
- फोटो : amarujala
आपको जानकार हैरानी होगी कि बद्रीनाथ में जिस दिन कपाट खुलते हैं उस दिन रावल साड़ी पहन कर पार्वती का श्रृंगार करके ही गर्भगृह में प्रवेश करते हैं। इसके बाद पूजा अर्चना होती है और तभी कपाट खोले जाते हैं।
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badrinath rawal
- फोटो : AmarUjala
इस मान्यता की वजह से ही पहाड़ में रावल को लोग भगवान की तरह पूजते हैं। वे उन्हें पार्वती का रूप भी मानते हैं। पहाड़ में जो लोग रावल को नहीं पूजते हैं उसे लोग अच्छा नहीं मानते हैं।
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कहा जाता है कि बदरीनाथ की मूर्ति शालग्रामशिला से बनी हुई है। जानकारों के मुताबिक यह मूर्ति देवताओं ने नारदकुण्ड से निकालकर स्थापित की थी। सिद्ध, ऋषि, मुनि इसके प्रधान अर्चक थे।
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जब बौद्धों का प्राबल्य हुआ तब उन्होंने इसे बुद्ध की मूर्ति मानकर पूजा आरम्भ की। शंकराचार्य की प्रचार-यात्रा के समय बौद्ध तिब्बत भागते हुए मूर्ति को अलकनन्दा में फेंक गए।
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आदिशंकराचार्य भारत-भ्रमण के क्रम में जब यहां आए, तो उन्होंने नारदकुंड में प्रवेश करके विष्णु के इस विग्रह का उद्धार किया और बद्रीनाथ के रूप में इसकी प्राण-प्रतिष्ठा की।
इसलिए बद्रीनाथ के दो और नाम दिए गए हैं। बदरीनाथ एवं बद्रीविशाल। जानकारों के मुताबिक बद्रीनाथ क्षेत्र में बदरी(बैर) के जंगल थे, इसलिए इस क्षेत्र में स्थित विष्णु के विग्रह को बद्रीनाथ की संज्ञा प्राप्त हुई।