उत्तराखंड के कालापानी क्षेत्र में घुसने के चीन के दावे के जवाब में हालिया दिनों में भारत के महासर्वेक्षक पद से सेवानिवृत्त हुए स्वर्ण सुब्बाराव ने कालापानी क्षेत्र में घुसने के चीन के दावे को लेकर बड़ा खुलासा किया है। बता दें कि डोकलाम गतिरोध खत्म करने के लिए एक साथ दोनों देशों के सैनिकों को हटाने के भारत के सुझाव को खारिज करते हुए चीन ने कहा कि यदि हमारी सेना उत्तराखंड के कालापानी क्षेत्र या कश्मीर में घुस जाएगी, तब दिल्ली क्या करेगी।
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kalapani dispute
एक हिंदी अखबार को दिए इंटरव्यू में स्वर्ण सुब्बाराव ने कालापानी में चीन के घुसने के दावे को बिना सिर पैर का दावा करार दिया है। उन्होंने कहा कि भारत और नेपाल के बीच उत्तराखंड के कालापानी क्षेत्र को लेकर सीमा विवाद को देशों ने कभी हवा देने की कोशिश नहीं की। इतना ही नहीं दोनों देश समय-समय पर सीमाओं को लेकर संयुक्त सर्वे करते रहे हैं।
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भारत चीन बॉर्डर
सुब्बाराव ने बताया कि उत्तराखंड में पिथौरागढ़ जिले का कालापानी क्षेत्र भारत, नेपाल व चीन सीमा का ट्राई जंक्शन (तीन अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर पड़ने वाला स्थान) है। तकनीकी रूप से भारत और नेपाल के बीच इस क्षेत्र में लंबे समय से सीमा स्पष्ट नहीं हो पाई है।
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- फोटो : pti
चीन यह मानता है कि यदि वह इस क्षेत्र में घुस आए तो भारत के साथ सीमा विवाद के चलते नेपाल उसकी मदद करेगा। चीन के कालापानी को लेकर किए गए इस दावे को खारिज करते हुए पूर्व महासर्वेक्षक ने कहा कि चीन कालापानी के विवाद का लाभ नहीं उठा सकता। क्योंकि नेपाल ने कभी इस क्षेत्र में सीमा की स्थिति स्पष्ट करने को लेकर दबाव नहीं बनाया है।
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भारत-चीन
- फोटो : The Washington Post
वर्ष 2007 में भारत-नेपाल के संयुक्त सर्वे में 182 नक्शे तैयार किए गए थे, जबकि तकनीकी कारणों के चलते इस सीमा पर चर्चा नहीं की गई। दोनों देशों ने किसी भी तरह के विवाद से बचने के लिए फिलहाल इस क्षेत्र संयुक्त सर्वे व किसी तरह की चर्चा से बाहर रखा है।
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उधर, वर्तमान में भारत के महासर्वेक्षक वीपी श्रीवास्तव का कहना है कि डोकलाम के ताजा हालात और कालापानी को लेकर चीन के ताजा बयान बाद इस पर आगामी वार्षिक बैठक में चर्चा की जाएगी। हालांकि फिलहाल भारत और नेपाल के बीच इस सीमा को लेकर जल्दबाजी जैसी कोई स्थिति नहीं है।
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- फोटो : AP
बता दें कि उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में कालापानी क्षेत्र 1815 में गोरखा युद्ध के बाद भारतीय भूमि का हिस्सा बन गया था। भारत में उस समय राज कर रही ब्रिटिश सरकार और नेपाल के बीच शांति संधि हुई। काली नदी के पश्चिम का क्षेत्र नेपाल के महाराजा ने ब्रिटिश सरकार को सौंप दिया। कालापानी से निकलने वाली धारा काली नदी है, लिहाजा इस धारा के पश्चिमी भाग के क्षेत्र तब से ही कुमाऊं मंडल का हिस्सा हैं।
1962 के भारत-चीन युद्ध के समय कालापानी में भी भारतीय सेना की छह टुकड़ियों की तैनाती की गई थी। युद्ध समाप्त होने के बाद चीन सीमा से सटे संपूर्ण भारतीय इलाके में आइटीबीपी की तैनाती की गई। इसलिए इस जगह पर सुरक्षा की जिम्मेदारी एसएसबी को दी गई है। इससे सात किलोमीटर आगे नाबीढांग में आईटीबीपी का डेरा है। बीच में सेना की पंजाब रेजीमेंट व कुमाऊं स्कॉट को भी तैनात किया गया है।