ग्लोबल वार्मिंग के कारण बदली पश्चिमी हवाओं की चाल से गंगा बेसिन जाड़े भर प्रदूषण भरे स्मॉग में डूबा रहेगा। इससे गंगा बेसिन क्षेत्र में बोई जाने वाली फसलों पर पाले की मार बढ़ जाएगी।
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धान की पुआल जलाना है प्रदूषण का कारण
- फोटो : अमर उजाला
अगर सर्दियों में खेतों के ठूंठ और सूखे पत्ते जलाए गए तो धुंध की यह चादर और मोटी हो जाएगी, जिससे वातावरण में प्रदूषण और बढ़ेगा। इससे जाड़े भर उत्तराखंड, यूपी, हरियाणा, पंजाब समेत कई राज्य प्रभावित होंगे।
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प्रदूषण का असर
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
दिल्ली में भरे स्मॉग को विज्ञानी कोई सामान्य घटना नहीं मान रहे हैं। अगर एहतियात न बरती गई तो यह धुंध कई राज्यों को अपनी आगोश में ले लेगी। यह जलवायु परिवर्तन का कान खड़े कर देने वाला लक्षण माना जा रहा है।
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प्रदूषण
- फोटो : amar ujala
मध्य एशियाई देशों से हवाएं अपने साथ तो फाइन पार्टिकल्स (एयरोसोल) लाई हैं, उनका प्रभाव वातावरण में सालों रहता है। जिस क्षेत्र में नमी अधिक होगी, ये वहां जाकर भर जाएंगे।
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गंगा
- फोटो : file photo
फसलों के साथ इससे मानव स्वास्थ्य प्रभावित होगा, जिसका दुष्प्रभाव धीरे-धीरे जाहिर होगा। विज्ञानियों का मानना है कि गंगा बेसिन में धुंध भरने से फसलें और वनस्पतियां प्रभावित होंगी। नदी के पानी से निकलने वाली नमी एयरोसोल और प्रदूषण के अन्य कणों को रोके रहेगी।
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crop
- फोटो : amar ujala
लोग खेतों में गेहूं के ठूंठ, पराली और खरपतवार आदि जलाते हैं। इनका धुआं माहौल में प्रदूषण और बढ़ा देगा। मौसम विज्ञानियों का कहना है कि गर्मी और बारिश आने पर प्रदूषण घटेगा, लेकिन जाड़े में गंगा बेसिन में प्रदूषण दिक्कतें और बढ़ाएगा।
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प्रदूषण
मध्य एशियाई देशों से पश्चिमी हवा के साथ आए फाइन पार्टिकिल्स दो-तीन साल तक बने रह सकते हैं। लेकिन गर्मी और बारिश में ये घट जाएंगे। इनका प्रभाव उत्तर भारत के राज्यों पर पड़ सकता है। ऐसे में खरपतवार, खेतों के ठूंठ आदि न जलाएं।
- डॉ. एके गुप्ता, वरिष्ठ मौसम विज्ञानी एवं निदेशक वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान