देहरादून में स्थित एक मंदिर महाभारत काल से भी जुड़ा है। जब महाभारत के सबसे पराक्रमी योद्घा को खुद भगवान शिव ने धनुर्धर विद्या सिखाई थी। पढ़ें, पूरी कथा...
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tapkeshwar temple
देहरादून मुख्य शहर से महज सात किमी दूर गढ़ी कैंट क्षेत्र में बने टपकेश्वर मंदिर में बड़ी संख्या में शिवभक्त दर्शन करने आते हैं। खासकर इस बार सावन पर भक्तों का यहां विशेष महत्व है। मान्यता है कि भगवान भोलेनाथ आदिकाल में यहां देवताओं की प्रार्थना से प्रसन्न होकर देवेश्वर के रूप में उन्हें न सिर्फ दर्शन देते थे, बल्कि उनकी हर मनोकामना पूर्ण करते थे। इस तपस्थली को ऋषि-मुनियों ने अपना वास बनाया और भोले शंकर के लिए तप किया।
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यह मंदिर महाभारत काल से भी जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि आचार्य द्रोण को इसी स्थान पर भगवना शंकर की कृपा प्राप्त हुई। उन्हें महादेव ने यहां अस्त्र-शस्त्र और पूर्ण धनुर्विद्या का ज्ञान स्वयं दिया।
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ऐसी अनेकों मान्यताएं भगवान टपकेश्वर के इस स्थान से जुड़ी हैं, जो अद्भुत हैं अलौकिक हैं। द्रोणपुत्र अश्वत्थामा की जन्मस्थली और तपस्थली भी यही मंदिर है। जहां आचार्य द्रोण और उनकी पत्नी कृपि की पूजा अर्चना से खुश होकर शिव ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया था।
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इसके बाद उनके यहां अश्वत्थामा का जन्म हुआ। मान्यता ये भी है कि अश्वत्थामा की दूध पीने की इच्छा और उनकी माता कृपि से उनकी इच्छा की पूर्ति न होने पर जब अश्वत्थामा ने घोर तप किया तब भगवान भोलेनाथ ने उन्हें वरदान के रूप में गुफा से दुग्ध की धारा बहा दी।
तब से यूं ही दूध की धारा गुफा से शिवलिंग पर टपकती रही और कलियुग में इसने जल का रूप ले लिया। इसलिए यहां भगवान भोलेनाथ को टपकेश्वर कहा जाता है। मान्यता यह भी है कि अश्वत्थामा को यहीं भगवान शिव से अमरता का वरदान मिला। उनकी गुफा भी यहीं है जहां उनकी एक मूर्ति भी विराजमान है। (अमर उजाला इस तथ्य की पुष्टि नहीं करता है। यह महज मान्यताओं पर आधारित है।)