हमेशा अपने भाईयों और पत्नी को तरजीह देने वाले धर्मपरायण युधिष्ठिर अंतिम समय में सभी को छोड़कर स्वर्ग के लिए अकेले निकले थे। जानिए, यह रोचक कथा...
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हम बात कर रहे हैं कि बदरीनाथ धाम से नारायण पर्वत पर 30 किमी दूर, जिसे स्वर्गारोहिणी भी कहा जाता है। यह क्षेत्र वर्षभर बर्फ से ढका रहता है। मार्ग का ज्यादातर हिस्सा हिमखंडों से पटे रहने के कारण इस सफर में तीन दिन लग जाते हैं।
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कुदरत ने यहां खुले हाथों से सुंदरता बिखेरी है। कहीं झरने तो कहीं दूर तक फैले बुग्याल (मखमली घास के मैदान) यात्रियों व प्रकृति प्रेमियों को सम्मोहित सा कर देते हैं। चारों ओर बर्फ से ढकी पहाड़िया असीम शांति का अहसास कराती हैं। जिधर नजर दौड़ाओ सैकड़ों प्रजाति के रंग-बिरंगे फूल यात्रियों की आगवानी करते नजर आते हैं।
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कहते हैं कि राजपाट छोड़ने के बाद पांचों भाई पांडव द्रोपदी सहित इसी रास्ते से स्वर्ग गए थे। लेकिन भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव व द्रोपदी तो स्वर्गारोहिणी पहुंचने से पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो गए।
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लेकिन, धर्मराज युधिष्ठिर ने एक स्वान के साथ पुष्पक विमान से सशरीर स्वर्ग के लिए प्रस्थान किया। इस मान्यता ने स्वर्गारोहिणी का महत्व और बढ़ा दिया। स्वर्गारोहिणी जाने के लिए जोशीमठ तहसील प्रशासन की अनुमति जरूरी है। इसके अलावा वन विभाग से भी यहां जाने की अनुमति लेनी पड़ती है।
स्वर्गारोहिणी में तीन किमी व्यास की एक विशाल झील है। यात्री स्वर्गारोहिणी पहुंचकर इस झील की परिक्रमा जरूर करते हैं। मान्यता है कि झील की परिक्रमा करने से उन्हें पुण्य प्राप्त होता है।
(अमर उजाला इन तथ्यों की तस्दीक नहीं करता है। यह केवल मान्यताओं के आधार पर ही पेश किए गए हैं।)