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क्या आप जानते हैं आखिर क्यों पड़ा माउंट एवरेस्ट का यह नाम? नहीं तो पढ़िए

Tue, 18 Apr 2017 05:48 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, देहरादून
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मसूरी की शांत वाद‌ियों के बीच स्थ‌ित यह घर कोई आम घर नहीं है। यह वह घर है जहां वर्ष 1832 से 1843 के बीच  भारत की कई ऊंची चोट‌ियों की खोज हुई और उन्हें मानच‌ित्र पर उकेरा गया।
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जी हां, यह घर है सर जॉर्ज एवरेस्ट का। कॉनेल सर जॉर्ज एवरेस्ट वेल्स सर्वेक्षक और भौगोलिक थे। इसके साथ ही वह 1830 से 1843 तक भारत के सर्वेयर जनरल रहे।
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सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट का नाम भी सर जॉर्ज एवरेस्ट के नाम पर ही पड़ा है। रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी ने 1848 में उनका यह सम्मान उनके सर्वे में योगदान के लिए किया था। 

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यह सर्वेक्षण 1806 में विलियम लैंब्टन द्वारा शुरू किया और यह कई दशकों तक चला गया था। एवरेस्ट की खोज करने वाले सर जॉर्ज एवरेस्ट का घर और प्रयोगशाला मसूरी में पार्क रोड में स्थित है जो गांधी चौक से लगभग 6 किमी. दूर है। 
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सर जॉर्ज का घर और प्रयोगशाला 1832 में बनाया गया था। उनका घर ऐसी जगह बना है जहां से कोई भी दून घाटी, अलगाड़ नदी और बर्फ से ढके हिमालय का सुंदर दृश्य दिखाई देता है। 
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लंबे समय की अनदेखी झेल रहा सर जॉर्ज एवरेस्ट का यह घर अब आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की देखरेख में है। अब यह जगह पर्यटक स्‍थल के रूप में जाना जाता है। पर्यटक यहां घूमने के मकसद से आते हैं। 
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एक मस्ती भरे पिकनिक स्पॉट के रूप में सर जॉर्ज एवरेस्ट हाउस पर्यटकों का भले ही न लुभाए, लेकिन वहां का वातावरण अक्सर लोगों को खुशी और शांति का अहसास कराता है।

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सर जॉर्ज एवरेस्ट ने मसूरी के हाथीपांव स्थित अपने जिस आवास और ऑब्जरवेटरी से चोटियों का सर्वे करने में सालों बिताए थे, अब उसे उत्तराखंड का सिरमौर बनाने की तैयारी है।
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पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारियों का मानना है कि म्यूजियम के माध्यम से यहां बाहर के पर्यटकों को आकर्षित किया जा सकेगा। साथ ही, पुरातात्विक न होने के बावजूद ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित किया जाना संभव होगा।
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