कांवड़ यात्रा शुरू हो गई है। ऐसे में हम शिवभक्तों को ऐसी बात बताने जा रहे हैं जिससे उनके पूजा का दोगुना फल मिल सके। तो चलिए जानते हैं इस मंदिर के बारे में...
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पुराणों के अनुसार श्रावण के महीने में भगवान शिव अपनी ससुराल यानी हरिद्वार में दक्ष नगरी कनखल में ही विराजते हैं। पूरे महीने वे यहीं से पूरे ब्रह्माण्ड की सत्ता को संचालित करते हैं।
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सावन के महीने में हरकी पैड़ी के जल से भोलेनाथ का जलाभिषेक करने का भी अपना महत्व है। बता दें कि हरकी पैड़ी ही वह स्थान है जहां पर समुद्र मंथन से निकले अमृत की बूंद गिरी थी। इसलिए शिव को उस स्थान से भरे गए गंगाजल से अभिषेक करने मात्र से बाबा प्रसन्न हो जाते हैं।
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कहा जाता है कि भगवान शिव ने अपने ससुर दक्ष प्रजापति का सिर जब धड़ से अलग कर दिया था तो सभी देवताओं के आग्रह पर उन्होंने राजा दक्ष को बकरे का सिर लगाकर पुनर्जीवन दिया था।
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daksh mandir
- फोटो : अमर उजाला
इसके बाद राजा दक्ष के आग्रह पर ही उन्होंने वचन दिया था कि साल में एक बार पूरे सावन के महीने वह कनखल में ही निवास करेंगे। तब से सावन में शिव कनखल में ही रहकर पूरी सृष्टि का संचालन करते हैं। इसीलिए यहां पर शिव का आशीर्वाद पाने के लिए हर साल भक्तों की भीड़ उमड़ती है।
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मंदिर के व्यवस्थापक स्वामी विश्वेश्वरपुरी
- फोटो : अमर उजाला
कनखल में भगवान शंकर की ससुराल है। राजा दक्ष की पुत्री सती से वे इसी नगरी में ब्याहे गए थे। भगवान शंकर और भगवान ब्रह्मा का सीधा रिश्ता इसी नगरी में बना था। राजा दक्ष वास्तव में ब्रह्मा के पुत्र थे। हरिद्वार के कण-कण में शिव के पदचिन्ह विद्यमान हैं।
मान्यता के अनुसार दक्ष के अलावा जिस स्थल पर भगवान शिव की बरात ठहरी थी, वह जनवासा मंदिर आज भी मौजूद है। नीलपर्वत स्थित नीलेश्वर मंदिर में बैठकर शिव ने कनखल में राजा दक्ष के यज्ञ का विध्वंस देखा था।