देवभूमि में मौजूद इस पर्वत में ऐसी जड़ी-बूटी मिलती है जो मरे इंसान को जिंदा कर सकती है। जिसे खोजने के लिए ब्रिटेन, जर्मनी, इटली के वैज्ञानिक बैचेन हैं।
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उत्तराखंड के चमोली जनपत स्थित एक गांव है द्रोणगिरि। यहां पर स्थित पर्वत के बारे में मान्यता है कि यह वही पर्वत है जिसे हनुमान जी संजीवनी बूटी के लिए उखाड़ ले गए थे।
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जिस संजीवनी बूटी के मिलने का दुनिया भर के चिकित्सा विज्ञानी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, उसकी खोज बजट के फेर में लटक गई है। संजीवनी बूटी ढूंढने का सीजन निकल गया है और इसके लिए गठित कमेटी को शासन ने इतना भी बजट नहीं दिया कि विज्ञानी द्रोण पर्वत पर जा सकें। अब संजीवनी की खोज के लिए केंद्र सरकार से 10 करोड़ रुपये बजट मांगा जा रहा है।
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ब्रिटेन, जर्मनी, इटली आदि देशों की एजेंसियां हिमालयी जड़ी-बूटियों की खोज और इनकी ताजा स्थिति जानने के लिए रात-दिन एक हुए हैं। वहीं संजीवनी बूटी तलाशने के लिए उत्तराखंड शासन ने पूर्व जड़ी-बूटी सलाहकार मायाराम उनियाल की अध्यक्षता में जो कमेटी गठित की थी, वह द्रोण पर्वत सिर्फ इसलिए नहीं जा पाई कि उसे फूटी कौड़ी भी नहीं मिली। प्रदेश शासन से इस मद में सिर्फ 20 लाख रुपये बजट मांगा गया था।
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रामायण की कथा के अनुसार लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध में मेघनाद के वार से लक्ष्मण मूर्छित होकर युद्धस्थल में गिर गए थे। जिसके बाद सुषेन वैद्य को बुलाया गया। सुषेन वैद्य ने लक्ष्मण की मूर्छा ठीक करने के लिए संजीवनी बूटी लाने को कहा। उन्होंने ही बताया कि यह बूटी द्रोणगिरि पर्वत पर पाई जाती है।
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साथ ही यह शर्त भी थी कि लक्ष्मण की मूर्छा ठीक करने के लिए बूटी का प्रातःकाल से पहले पहुंचना जरूरी था। चूंकि वहां पर सबसे तेज मारूति नंदन हनुमान जी ही थे इसलिए इसलिए संजीवनी बूटी लाने के लिए उन्हें ही भेजा गया।
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संजीवनी बूटी लाने के लिए हनुमान जी द्रोणगिरि पर्वत पर पहुंच तो उन्हें भ्रम हो गया और वह बूटी पहचान ही नहीं पा रहे थे। उधर रात बीत रही थी और सुबह तक बूटी का पहुंचना जरूरी था।