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सावन के तीसरे सोमवार पर जानिए शिवलिंग पूजन से जुड़ी यह अनोखी बात

Mon, 08 Aug 2016 04:47 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, देहरादून
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भगवान शिव - फोटो : AmarUjala
देवभूमि उत्तराखंड के इस ऐतिहासिक और प्राचीनतम मंदिर से दुनिया में शिवलिंग के पूजन की शुरुआत हुई।
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जागेश्वर धाम - फोटो : अमर उजाला
अल्मोडा जिले के मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर देवदार के वृक्षों के घने जंगलों के बीच पहाडी पर स्थित जागेश्वर महादेव के मंदिर परिसर में पार्वती, हनुमान, मृत्युंजय महादेव, भैरव, केदारनाथ, दुर्गा सहित कुल 124 मंदिर स्थित हैं जिनमें पूजा होती है।
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jageshwar dham
भारतीय पुरातत्व विभाग ने इस मंदिर को देश के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक बताया है। इसके ‌लिए मंदिर परिसर में घोषणा करता एक शिलापट्ट भी लगाया गया है।

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एक सचाई यह भी है कि इसी मंदिर से ही भगवान शिव की लिंग पूजा के रूप में शुरूआत हुई थी। यहां की पूजा के बाद ही पूरी दुनियां में शिवलिंग की पूजा की जाने लगी और कई स्वयं निर्मित शिवलिंगों को बाद में ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजा जाने लगा।
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मंदिर में स्थापित शिवलिंग स्वयं निर्मित है और इसकी कब से पूजा की जा रही है इसकी सही जानकारी नहीं है। लेकिन यहां भव्य मंदिरों का निर्माण आठवीं शताब्दी में किया गया है। घने जंगलों के बीच विशाल परिसर में पुष्टि देवी (पार्वती), नवदुर्गा, कालिका, नीलकंठेश्वर, सूर्य, नवग्रह सहित 124 मंदिर बने हैं।
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jageshwar dham
बताया गया कि दुनिया में भगवान शिव की लिंग के रूप में पूजा की शुरूआत इसी मंदिर से हुई थी और इसका जिक्र शिवपुराण के मानस खण्ड में हुआ है। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भारत यात्रा के दौरान यहां की यात्रा की थी और उसने इस मंदिर
की प्राचीनता के बारे में जिक्र भी किया है।।
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यह मंदिर साक्ष्यों के आधार पर करीब ढाई हजार साल पुराना है क्योंकि इस मंदिर की दीवारों की प्राचीनता इसकी गवाह है। उन्होंने बताया कि मंदिर पर पहले एक बोर्ड लगा था, जिसको पुरातत्व विभाग द्वारा हटा दिया गया है।

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उन्होंने कहा कि चंदकाल के राजाओं ने इस मंदिर का उद्धार कराया था और बाद में कत्यूरी राजाओं ने भी जागेश्वर मंदिर के लिए कई गांव दान दिये, जिससे मंदिर में पूजा पाठ की व्यवस्था हुआ करती थी।

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वर्तमान में मंदिर की देख रेख का काम भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा किया जा रहा है।
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बताया गया कि जागेश्वर को ही नागेश्वर माना जाता है क्योंकि इस मंदिर के आसपास के अधिकांश इलाकों का नाम नाग पर ही आधारित हैं। उन्होंने बताया कि बेरीनाग, धौलेनाग, लियानाग, गरूड स्थानों से भी यह साबित होता है कि यह इलाका नाग बहुल था और इसी लिए इसका नाम नागेश्वर भी पड़ा, लेकिन बाद में इसे जागेश्वर भी कहा जाने लगा।
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