उत्तराखंड में हल्द्वानी के तराई में हर साल बरसात का एक दिन कम हो रहा है। यही नहीं बारिश की मात्रा भी कम हुई है। यह बात पंत नगर विश्वविद्यालय के मौसम विभाग के अध्ययन में सामने आई है।
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बारिश
- फोटो : अमर उजाला
अगर यह बदलाव जारी रहा और बारिश के दिन घटकर 30 से 32 तक रह जाते हैं, तो तराई में घान उगाना मुश्किल होगा। इसके अलावा, अन्य फसलों के बारे में भी विचार करना होगा। बारिश के दिनों का यह आंकलन तराई के इलाकों का है। यह स्थिति दूसरी जगहों पर भी हो सकती है।
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बारिश
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पहले ‘सतझड़’ (सात दिन लगातार बारिश) या लगातार कई दिनों तक बारिश होने की बात बुजुर्ग करते थे। पिछले कुछ सालों में इस तरह लगातार कई दिनों तक की बारिश शायद ही किसी साल तराई में हुई हो। बारिश को लेकर बुजुर्गों के आकलन कोरे नहीं थे। जी हां, बरसात के दिन कम हुए हैं। हर साल बरसात का एक दिन कम हो रहा है।
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heavy water logging in dehradun due to rain
पंतनगर विश्वविद्यालय के मौसम विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. अजीत सिंह नैन कहते हैं कि विवि की अपनी ऑब्जरवेटरी है, जिसमें 17 साल (1998-2015 तक पंतनगर और आसपास का आंकड़ा) तक की बारिश से जुड़ी जानकारी, आंकड़ों का अध्ययन और विश्लेषण किया गया है। इससे पता चलता है कि पहले मानसून में 65 दिन बरसात होती थी, जो अब घटकर 50 दिन ही रह गई है। रेनफॉल भी कम हुआ है। हर साल 5 एमएम बारिश कम हो रही है। 1998 में 1400 एमएम बारिश हुई थी, जो लगातार घट रही है।
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due to heavy rain haridwar highway block
केवल बारिश होने से गणना नहीं होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार अगर 2.5 एमएम बारिश रिपोर्ट हो तो उसकी बरसात के दिन में गणना होती है। बारिश के कम हो रहे दिनों के पीछे क्लाइमेट चेंज, अलनीनो का प्रभाव, लैंड यूज चेंज होना आदि कारण हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार बरसात के दिनों के सिमटने से एक दिन में ज्यादा और तीव्र बारिश होने लगी है। इससे भूक्षरण और भूस्खलन बढ़ा है। मुख्य कृषि अधिकारी डी कुमार कहते हैं कि रुक-रुक कर और ज्यादा दिन बारिश होना ही ठीक है। इससे जमीन पानी को सोखती है। एक साथ और ज्यादा बारिश होने से दलहनी फसलों को भी नुकसान होता है। इसके अलावा तेज बहाव के कारण भूक्षरण होने से जमीन में न्यूट्रिशन की मात्रा भी प्रभावित होती है।