भारतीय संस्कृति में श्राद्ध पक्ष की बड़ी महत्ता है। शास्त्र का निर्देश है कि माता-पिता आदि के निमित्त नाम और गोत्र का उच्चारण कर श्राद्ध किया जाता है। मृत्यु के बाद पितृ चाहे जिस योनि में चले जाएं, उस जीव को पितृ भाव वहीं प्राप्त हो जाता है। प्राप्ति का प्रकार अलग-अलग होता है। पशु योनी में तृण रूप, सर्प योनि में वायु रूप, यक्ष योनि में पेय रूप, मानव योनि में अन्न रूप और प्रेत योनि में रुधिर रूप श्राद्ध का अंश लेता हैं।