उत्तराखंड के पौड़ी क्षेत्र में पांडवों की याद में चलने वाला सदियों पुराना मोरी मेला रविवार को धूमधाम से संपन्न हो गया।
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PICS: इस जंगल में पांडवों ने बिताए थे 12 साल
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मेले के अंतिम दिन चीड़ के दो बड़े पेड़ों को जड़ से उखाड़ने की अनूठी परंपरा को देखने के लिए हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी।
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PICS: इस जंगल में पांडवों ने बिताए थे 12 साल
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परंपरा के अनुसार लोग चीड़ के दो पेड़ उखाड़कर उन्हें तमलांग गांव तक ले जाते हैं। मान्यता के अनुसार अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने अपने अस्त्र-शस्त्र समी पेड़ के नीछे छिपाकर रखे थे। चीड़ के पेड़ को समी का प्रतिरूप माना जाता है।
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करीब चालीस फीट ऊंचे चीड़ के पेड़ों को उखाड़ने के दृश्य ने वहां लोगों को पलक झपकाने तक मौका नहीं दिया। पहला पेड़ बीस मिनट में ही जड़ से उखाड़ दिया।
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मान्यता है कि प्राचीन समय में चीड़ के पेड़ों को हनुमान और नारायण का पश्वा अकेले ही उखाड़ता था। अब पेड़ पर पहले हनुमान चढ़ता है। उसके पीछे दो-तीन अन्य लोग चढ़ते हैं।
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दोनों पेड़ों को बिना जमीन में गिराए सैकड़ों लोग तमलाग गांव लाए। अज्ञातवास के दौरान पांडवों की जननी कुंती ने तमलाग को अपनी ससुराल और कुंडी गांव को मायका माना था।
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चीड़ के पेड़ को उखाड़कर कंधे पर रखकर तमलाग ले जाते युवक।
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तमलाग गांव में कई घंटे तक पांडव नृत्य हुआ।
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12 साल में होने वाले मोरी मेले की इस परंपरा को देखने के लिए आसपास के गांवों के लोग सुबह सात बजे से ही सुमेरूपुर के जंगलों में जुटना शुरू हो गए थे।