विभिन्न पंचांगों और ज्योतिषाचार्यों के अनुसार भगवान भोलेनाथ को शिव चौदस विशेष प्रिय है। फागुन मास की कांवड़ महाशिवरात्रि को चढ़ाई जाती है, जबकि श्रावण मास की कांवड़ त्रयोदशी और शिव चौदस की मिल से चढ़नी शुरू होती है। चतुदर्शी का व्रत भी रात को ही रखा जाएगा और महारात्रि की चार पहर पूजा भी रात के चार पहरों में होगी।
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मंदिर में पूजन करते श्रद्धालु।
शनिवार को दिन में व्रत खोला जाएगा। ज्योतिषाचार्य पं. विष्णु शर्मा के अनुसार शुक्रवार की रात 9 बजकर 51 मिनट का अत्यंत शुभ मुहूर्त आर्द्रा नक्षत्र के साथ आता है। यह नक्षत्र शनिवार को ही शाम 6:30 बजे तक बना रहेगा। प्रदोष का व्रत शुक्रवार को रखा जाएगा।
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- फोटो : ANI
यह है जलाभिषेक की विधि
शिवरात्रि का व्रत अर्द्धरात्रिव्यापिनी चतुदर्शी में होता है। लोक परंपराओं के हिसाब से अलग-अलग क्षेत्रों के लोग त्रयोदशी से जलाभिषेक शुरू कर देते हैं। भगवान शिव के जलाभिषेक के समय साधक को ईशान कोण अथवा पूरब की ओर मुख कर कुश आसन पर बैठना चाहिए। शिवलिंग पर पंचामृत, दूध, दही, शहद, घी, शर्करा, गंगा जल, बेल पत्र, कनेर, श्वेतार्क, सफेद आखा, धतूरा, कमलगट्टा, गुलाब और नील कमल चढ़ाकर अभिषेक करना चाहिए। गंगा जल से शिवलिंग को स्नान कराते समय पांच मंत्रों का जाप किया जाता हैं। कांवड़ यात्रा के समय चूंकि, इतना स्थान नही होता अत: केवल जल चढ़ाकर भी अभिषेक हो जाता है। धूप और अगरबत्ती जहां भी जगह मिल जाए, वहां जला देनी चाहिए।
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maha shivratri
शिव भक्तों के लिए शिव चालीसा विशेष महत्व रखता है। कई जगह तो प्रतिदिन शिव महापुराण की कथा का श्रवण किया जाता है। चूंकि, कांवड़ यात्रा समयहीन होती है, अत: जब मौका मिले, शिव चालीसा का पाठ कर लें। निर्जन मंदिर में जाकर पूजा का विशेष विधान बताया गया है।
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harki paidi
महाशिवरात्रि के दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु व्रत रखकर दान-पुण्य करते हैं। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से भगवान भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं और मनचाही मुराद पूरी होती है। वहीं दान करने से सुख और समृद्धि बढ़ती है।
भगवान शिव कल्याण स्वरूप देव हैं। वे देवताओं को भी दुर्लभ हैं, ऋषियों और मुनियों को भी। लेकिन भोल भाले बाबा आम आदमी के लिए, भक्त के लिए बेहद सुलभ है। इन्हें न रत्नों की जरूरत है, और न सामग्री की। वे तो नाम से ही खुश हो जाते है।