वर्ष 1991 में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ हुए थे। तिवारी विधायक तो बन गए, लेकिन उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार न बनने के कारण वह पांच वर्ष सिर्फ बतौर विधायक ही काम करते रहे। इसी तरह, केंद्र में कांग्रेस की सरकार तो बनी, लेकिन एनडी लोकसभा तक नहीं पहुंच पाए और प्रधानमंत्री की दौड़ में पिछड़ गए। माना जाता है कि दिल्ली में उनकी गैरमौजूदगी का बड़ा फायदा पीवी नरसिम्हा राव को मिला।