कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व दो दिन मनाया जाएगा। भक्तों से निवेदन है कि पूजन के वक्त वह इन बातों का खास ध्यान रखें।
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कृष्णा
रविवार को अर्ध रात्रि से अष्टमी लग रही है। इसलिए श्रद्धालुओं को रविवार को व्रत रखकर पर्व मनाना पड़ेगा। वैष्णवों और बैरागियों की जन्माष्टमी सोमवार को पड़ रही है। नंदोत्सव मंगलवार को मनाया जाएगा। रविवार को रात्रि 8.48 बजे तक सप्तमी तिथि है। इस प्रकार जिस समय भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था, वह तिथि रविवार की रात को ही पड़ेगी।
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कृष्णा
सोमवार की रात को 9.20 बजे तक अष्टमी है और उसके बाद नवमी तिथि लग जाएगी। संयोग यह है कि भगवान का जन्म जिस रोहिणी नक्षत्र में हुआ था वह नक्षत्र सोमवार को ही लग रहा है, जबकि सोमवार को आधी रात नवमी लग जाएगी। इस प्रकार विद्वानों का मानना है श्रीकृष्ण जन्मोत्सव रविवार को ही मनाया जाना चाहिए।
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डेमो
- फोटो : demo pic
स्मार्त सम्प्रदाय के लिए यही दिन धर्मसिंधु द्वारा सुझाया गया है, लेकिन रविवार को रोहिणी नक्षत्र उपलब्ध नहीं होगा, उस दिन कृतिका नक्षत्र पड़ रहा है। बहरहाल कृष्ण जन्मोत्सव दोनों दिन मनाया जाएगा। रविवार को शीतला सप्तमी भी है और धूमास योग पड़ रहा है। सोमवार को जन्माष्टमी का पर्व प्रवर्धमान नक्षत्र में मनाया जाएगा। गोकुल में भगवान श्रीकृष्ण के आगमन की खुशियां मंगलवार को नंदोत्सव के रूप में वैष्णव सम्प्रदाय द्वारा मनाई जाएंगी।
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कृष्ण
जन्माष्टमी पर पूजन करते वक्त हर भक्त को इन पांच बातों का खास ध्यान रखना होगा। कृष्ण जी के प्रिय माखन-मिश्री, पीले वस्त्र, पीले फल, मोर पंख और तुलसी घर के मंदिर में या किसी ऐसे मंदिर में जा कर अर्पित करें। जहां कृष्ण जन्म मनाया जा रहा हो।
स्नान करके साफ वस्त्र पहन धारण करके ही भगवान कृष्ण की प्रतिमा को स्पर्श करें। कृष्ण को चढ़ाई जाने वाली सभी चीजों को गंगा जल छिड़कर पवित्र कर लें। भगवान को सभी चीजें दाहिने हाथ से अर्पित करें। तुलसी दल, माखन मिसरी और पीले फल प्रसाद के रूप में लोगों को बांट दें।