दशहरे के मौके पर आज हम आपको बता रहे हैं एक ऐसी जगह के बारे में जहां लंकापति रावण को मारने के बाद श्री राम आकर ध्यानमग्न हो गए थे। साथ ही उन्होंने वर्षों तक तपस्या कर रावण को मारने का पश्चाताप भी किया था।
विज्ञापन
2 of 10
रावण्ा
जी हां, यह पुराणों में भी कहा गया है कि भगवान श्री राम को रावण के मारे जाने का दुख भी था। रावण भगवान शिव का महाभक्त था। उसे मारकर पाप के भागी न बनें इसलिए श्री राम ने तपस्या भी की थी।
विज्ञापन
3 of 10
chandrashila
यह जगह है उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के चोपता से तीन किलोमीटर दूर स्थित चंद्रशिला। यह शिला महादेव के दुनिया में सबसे ऊंचे शिवालय तुंगनाथ धाम के पास है। इसलिए इस मंदिर से भगवान राम का भी कनेक्शन है।
4 of 10
tungnath
पुराणों में कहा गया है कि रामचंद्र शिव को अपना भगवान मानकर पूजते थे। कहते हैं कि लंकापति रावण का वध करने के बाद रामचंद्र ने तुंगनाथ से डेढ़ किलोमीटर दूर चंद्रशिला पर आकर ध्यान किया था। रामचंद्र ने यहां कुछ वक्त बिताया था। चौदह हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित चंद्रशिला पहुंचकर आप विराट हिमालय की सुदंर छटा का आनंद ले सकते हैं
विज्ञापन
5 of 10
tungnath highest temple of lord shiva
चंद्रशिला के टॉप पर पहुंचकर हिमालय के नंदा देवी, त्रिशूल और केदार डोम का खूबसूरत नजारा दिखता है। ये ट्रैक इजी होने की वजह से काफी फेमस है, यहां तक कि इसे 7 साल से बड़े बच्चे भी ट्रैक कर सकते हैं।
विज्ञापन
6 of 10
tungnath highest temple of lord shiva
तुंगनाथ की खूबसूरती देखते ही बनती है। यह सबसे ऊंचाई पर स्थित है। इसकी महत्ता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि यह पंच केदारों में से एक माना गया है। कहते हैं कि तुंगनाथ में 'बाहु' यानि शिव के हाथ का हिस्सा स्थापित है। यह मंदिर करीब एक हजार साल पुराना माना जाता है
विज्ञापन
7 of 10
tungnath highest temple of lord shiva
पंचकेदारों में द्वितीय केदार के नाम प्रसिद्ध तुंगनाथ की स्थापना कैसे हुई, यह बात लगभग किसी शिवभक्त से छिपी नहीं। कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध के बाद पांडव अपनों को मारने के बाद व्याकुल थे।
8 of 10
tungnath highest temple of lord shiva
इस व्याकुलता को दूर करने के लिए वे महर्षि व्यास के पास गए। व्यास ने उन्हें बताया कि अपने भाईयों और गुरुओं को मारने के बाद वे ब्रह्म हत्या के कोप में आ चुके हैं। उन्हें सिर्फ महादेव शिव ही बचा सकते हैं। व्यास ऋषि की सलाह पर वे सभी शिव से मिलने हिमालय पहुंचे लेकिन शिव महाभारत के युद्ध के चलते नाराज थे।
9 of 10
तुंगनाथ
- फोटो : file photo
इसलिए उन सभी को भ्रमित करके भैंसों के झुंड के बीच भैंसा (इसीलिए शिव को महेश के नाम से भी जाना जाता है) का रुप धारण कर वहां से निकल गए। लेकिन पांडव नहीं माने और भीम ने भैंसे का पीछा किया। इस तरह शिव के अपने शरीर के हिस्से पांच जगहों पर छोड़े। ये स्थान केदारधाम यानि पंच केदार कहलाए
कपाट खुलने के मौके पर तृतीय केदार तुंगनाथ धाम को 8 कुंतल रंग-बिरंगे फूलों से सजाया गया।
- फोटो : Amar Ujala
बताया जाता है कि पांडवों ने ही इस मंदिर की स्थापना की थी। तुंगनाथ की चोटी तीन धाराओं का स्रोत है, जिनसे अक्षकामिनी नदी बनती है। पुराणों में कहा गया है कि रामचंद्र शिव को अपना भगवान मानकर पूजते थे।
(अमर उजाला इन तथ्यों की तस्दीक नहीं करता है, यह केवकल मान्यताओं के आधार पर पेश किए गए हैं।)