घाट पर अतिविशिष्ट मेहमानों के लिए कुर्सी लगाई गई थी। समीप ही स्थित चबूतरे पर पूजा की बेदी सजा दी गई थी। पुरोहितों में से दया व्याघ्र पूजन प्रक्रिया कर रही थीं जबकि शशि त्रिपाठी ने मंत्रों का संस्कृत में घोष किया और क्रमश: अंग्रेजी में अनुवाद कर राजा और रानी को उनका अर्थ बताया। पुरोहित शशि त्रिपाठी और दया व्याघ्र ने बताया कि सबसे पहले विधान के अनुसार गणेश पूजन करवाया गया।