सावन में कांवड़ का विशेष महत्व है। मान्यता है कि सावन माह भगवान भोलेनाथ को प्रिय है और इसमें जलाभिषेक करने से भक्त की मनोकामनाएं पूर्ण होती है। इस बार दस जुलाई को सोमवार से सावन शुरू हो रहा है। ज्योतिषाचार्य इसे शुभ बता रहे हैं।
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परशुराम
- फोटो : wikipedia
ज्योतिषाचार्य पंडित संदीप भारद्वाज शास्त्री बताते हैं कि भगवान परशुराम ने उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के पास एक गांव में पुरामहादेव में मंदिर की स्थापना की। श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार को वे कांवड़ में गंगाजल ले जाकर शिव की पूजा अर्चना करते थे। तब से ये परंपरा आज भी कायम है।
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lord rama sybol image
आनंद रामायण के अनुसार भगवान राम पहले कांवड़िया थे। उन्होंने बिहार के सुल्तानगंज से कांवड़ में गंगाजल भरकर बाबाधाम में शिवलिंग का जलाभिषेक किया था।
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समुद्र मंथन
पुराणों के अनुसार कांवड़ यात्रा की परंपरा समुद्र मंथन से जुड़ी है। मंथन से निकले विष को पी लेने के कारण भगवान शिव का कंठ नीला हो गया और वे नीलकंठ कहलाए। इसके बाद शिव को विष के नकारात्मक प्रभावों से मुक्त कराने के लिए उनके अनन्य भक्त रावण ने ध्यान किया। तत्पश्चात कांवड़ में जल भरकर रावण ने पुरा महादेव स्थित शिवमंदिर में शिवजी का जल अभिषेक किया। इससे शिवजी विष के नकारात्मक प्रभावों से मुक्त हुए और यहीं से कांवड़ यात्रा की परंपरा का प्रारंभ हुआ।
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श्रवण कुमार
विद्वानों का कहना है कि सर्वप्रथम त्रेतायुग में श्रवण कुमार ने पहली बार कांवड़ यात्रा की थी। माता-पिता को तीर्थ यात्रा कराने के क्रम में श्रवण कुमार हिमाचल के ऊना क्षेत्र में थे, जहां उनके अंधे माता-पिता ने उनसे हरिद्वार में गंगा स्नान करने की इच्छा प्रकट की। इच्छा पूरी करने के लिए श्रवण कुमार उन्हें कांवड़ में बैठा कर हरिद्वार लाए और उन्हें गंगा स्नान कराया। वापसी में वह अपने साथ गंगाजल ले गए। इसे कांवड़ यात्रा की शुरुआत माना जाता है।
सावन का महीना भोलेनाथ को विशेष प्रिय है, इसलिए इस मौके पर भक्त कांवड़ लेकर निकलते हैं और शिव को गंगाजल अर्पित करते हैं। माना जाता है कि सावन में भगवान आशुतोष का गंगाजल व पंचामृत से अभिषेक करने से उन्हें शीतलता मिलती है और वे प्रसन्न होते हैं। लक्सर में भी पथलेश्वर महादेव मंदिर व खानपुर के जटा महादेव मंदिर में सावन के दौरान जलाभिषेक करते हैं।