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10 साल बाद घर लौटा आईटीबीपी का लापता जवान, देखकर पत्नी के छलक पड़े आंसू, तस्वीरें...

Thu, 21 Nov 2019 04:25 PM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंपावत
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लापता जवान घर लौटा - फोटो : अमर उजाला
‘लंबे अरसे बाद उनसे यूं मुलाकात हुई, आंखों ही आंखों में सारी बात हुई, यूं तो मिलना तय न था, फिर भी सरेराह ये बरसात हुई...।’ यह बारिश आसमान से नहीं बल्कि पति विक्रम और पत्नी मंजू की आंखों से हो रही थी जो 10 साल बाद एक दूसरे से मिल रहे थे। बुधवार सुबह 9:25 बजे, पूरे 10 साल से लापता विक्रम की घर वापसी पर हुई इस मुलाकात के साक्षी दोनों भाई, भाभी, बेटे, बहु और पूरा परिवार था। हर किसी की आंखों में खुशी के आंसू थे। सभी ने पूजा-अर्चना और मंगल गीत गाकर विक्रम का स्वागत किया।
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घर लौटने पर खुशी मनाता परिवार - फोटो : अमर उजाला
आईटीबीपी कानपुर में तैनात एसआई दो फरवरी 2010 से लापता थे। सुराग लगने पर दिल्ली से उनके दो रिश्तेदार नरेश माहरा और सुरेश सिंह बुधवार को विक्रम सिंह को लेकर डुंगरासेठी गांव पहुंचे। विक्रम सिंह को देखकर पत्नी मंजू, बड़े भाई आईटीबीपी के रिटायर्ड अधिकारी डूंगर सिंह व नारायण सिंह, भाभी जैमंती देवी, गीता देवी, बेटे संदीप, प्रदीप आदि का खुशी का ठिकाना न रहा। परिजनों का कहना है कि बेशक 10 साल का यह वनवास खत्म हो गया, लेकिन यह वक्त पूरे परिवार के लिए तकलीफों भरा रहा। 
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परिवार के साथ घर लौटा जवान - फोटो : अमर उजाला
खोजबीन, पूछताछ और तमाम तरह की धार्मिक गतिविधियों में मोटी रकम भी खर्च हुई। अलबत्ता कभी भी उन्होंने विक्रम के सकुशल वापसी की उम्मीदें नहीं छोड़ी। परिजन बताते हैं कि इस दौरान आईटीबीपी की ओर से उन्हें विक्रम सिंह की जमा राशि के तीन लाख रुपये जरूर मिले। परिजनों का कहना है कि उनके स्वास्थ्य को लेकर डॉक्टरों को दिखाया जाएगा। साथ ही परिजन फरवरी 2010 में की गई गुमशुदगी की रिपोर्ट को निरस्त कराएंगे। 

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जवान विक्रम सिंह - फोटो : अमर उजाला
विक्रम अपने गांव से आखिरी बार 20 दिसंबर 2009 को निकले थे। पूरे नौ साल 11 महीने बाद उनकी घर वापसी हुई है। अब 58 साल के हो चुके विक्रम का कहना है कि छुट्टी पूरी होने के बाद वे जब अंतिम बार नौकरी के लिए निकले थे, तब गांव में रोड नहीं थी। काफी हिस्सा पैदल चल कर जाना था। अब जब वे घर पहुंचे हैं, तो घर तक सड़क पहुंच गई है। 10 वर्ष के दौरान दोनों बेटियों रेखा, हेमा और एक बेटे संदीप का विवाह हो चुका है। दूसरा बेटा प्रदीप अभी पढ़ रहा है। इन सब काम में उनके बड़े भाइयों और रिश्तेदारों ने मदद की। अभी विक्रम सिंह को कई चीजें ठीक से याद नहीं है। 
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जवान विक्रम सिंह को मिठाई खिलाता परिवार - फोटो : अमर उजाला
विक्रम सिंह को बीते दस वर्षों का घटनाक्रम याद नहीं है। वे इस दौरान कहां-कहां गए, कैसे रहे, कहां खाया और क्या-क्या किया ये बातें उन्हें याद नहीं। रिश्तेदारों ने जब उन्हें खोज निकाला तो उनकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी, कपड़े गंदे थे और बेसुध हाल में थे। विक्रम के परिजन बताते हैं कि अवकाश के बाद 20 दिसंबर 2009 को आईटीबीपी कानपुर पहुंचने के बाद जनवरी 2010 के आखिर में विभागीय कार्य से चंडीगढ़ उच्च न्यायालय जाना पड़ा। वहां से एक फरवरी को वे वापस कानपुर आए। आईटीबीपी पहुंचने के बाद दो फरवरी की सुबह को वे अपने बिस्तर से गायब मिले। परिजन बताते हैं कि तब अधिकारियों ने बताया था कि सुबह करीब पांच बजे चाय देने के लिए पहुंचे कर्मी ने उनके गायब होने की सूचना दी। 
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विक्रम सिंह को ढ़ूढने में मदद करने वाले नरेश माहरा और सुरेश सिंह - फोटो : अमर उजाला
करीब छह माह पहले दिल्ली में काम करने वाले चंपावत के सल्ली गांव के निवासी नाथ सिंह की मुलाकात दिल्ली के हनुमान मंदिर में भटकते विक्रम सिंह से हुई। दोनों एक दूसरे को जानते नहीं थे। मगर बात-बात में विक्रम सिंह ने अपने गांव डुंगरासेठी का जिक्र किया। इस बात को नाथ सिंह भूल भी गए। कुछ दिनों पहले नाथ सिंह छुट्टी में घर आए, तो डूंगरासेठी के रिटायर्ड शिक्षक देव सिंह चौधरी से मुलाकात होने पर विक्रम सिंह के हनुमान मंदिर में बेसुध हाल में होने की बात कही। शिक्षक देव सिंह ने विक्रम सिंह के परिजनों को पूरी बात बताई, जिसके बाद विक्रम को ढूंढा जा सका।  
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