देश ही नहीं विश्व भर में योग को नई पहचान दिलाने वाले योग गुरु बाबा रामदेव ने गंगोत्री की गुफाओं में साधना से आध्यात्मिक प्रेरणा पाकर योग को जन-जन तक पहुंचाने का काम किया है। यहीं उन्होंने स्वामी अपरोक्षानंद से योग के गुर सीखे।
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वे गंगोत्री को ही अपनी आध्यात्मिक जन्मभूमि मानते हैं। आज भी यहां बने अपने पुराने दिव्य योग मंदिर के माध्यम से वे साधु संतों को पतंजलि के उत्पाद और सब्जी आदि जरूरत की सामग्री देकर निरंतर उनकी सेवा करते आ रहे है।
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बाबा रामदेव ने वर्ष 1992 से 94 के बीच श्री कृष्ण आश्रम, गंगाबाग, सोहम गुफा, गौरीकुंड आदि जगहों में साधना करके आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया। 2014 में वह गंगोत्री के आगे तपोवन में भी गए। उन्होंने यहीं से प्रेरणा पाकर गांवों को स्वावलंबी बनाने की मुहिम छेड़ी।
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1995 में उन्होंने संन्यास ग्रहण करके योग को गुफाओं, कंदराओं एवं संभ्रांत लोगों के दायरे से बाहर लाकर जन सामान्य तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया।
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गंगोत्री में 12 वर्षों से रह रहे स्वामी रामदेव की धरोहर दिव्य योग मंदिर संभालने वाले स्वामी राघवानंद बताते है कि आचार्य बालकृष्ण भी यहां रहे और उनका यहां आना-जाना लगा रहता है। हमारे परिसर में आर्चा, च्योरा, शतावर, रुद्रवंती, जटामशी, भोटिया चाय तथा च्यवनप्राश में इस्तेमाल होने वाली जड़ी बूटियां पनपाई जा रही है।
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धराली गांव में पतंजलि द्वारा तीस नाली जमीन लेकर वहां गांव वालों से जड़ी बूटी की खेती कराने की योजना है। फल प्रसंस्करण के लिए भवन तैयार किया गया, किंतु 2013 की आपदा में जमीन और भवन को नुकसान पहुंचने से यह अभियान अभी आगे नहीं बढ़ पाया।
श्रीकृष्ण आश्रम धाम के महंत ब्रह्मचारी आत्मस्वरूप भी मानते है कि गंगा के उद्गम क्षेत्र में योगाभ्यास दिव्य एहसास कराने वाला होता है। गंगोत्री से बाबा रामदेव के संबंधों के अलावा दशकों से देशी विदेशी शिष्यों को योग सिखाने वाले स्वामी सुंदरानंद भी यहां योग ध्यान टावर बना रहे है। इससे गंगोत्री में देशी विदेशी साधकों की आमद बढ़ने की संभावना है।