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Women's Day: 40 साल की उम्र में मिला मंच, फिर लिखी सफलता की ऐसी इबारत कि दुनिया में हो गया नाम

Thu, 08 Mar 2018 07:18 AM IST
न्यूज डेस्क/अमर उजाला, देहरादून
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basanti bisht - फोटो : file photo
महिला दिवस पर पढ़िए वर्जनाओं को तोड़कर सफलता की नई इबारत लिखने वाली 64 साल की पद्मश्री बसंती बिष्ट की कहानी...
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basanti bisht - फोटो : file photo
बसंती बिष्ट का जन्म उत्तराखंड के एक सीमांत गांव ल्वाणी में हुआ। यह गांव नंदा देवी राजजात यात्रा के मार्ग पर स्थित है। नंदा देवी को क्षेत्र के लोग अपनी बेटी की तरह पूजते हैंए इसलिए यहां वर्षों से नंदा देवी के जागर गायन की परंपरा विद्यमान है। जागर गायन को मूलत: पुरुषों का कार्य माना जाता था। इसलिए बचपन में जब बसंती ने जागर गाने की अपनी इच्छा जाहिर की तो उनके खुद के परिवार ने उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी।

 
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Basanti Bisht - फोटो : AmarUjala
बसंती का मन बचपन से गायन में रमता था लेकिन सामाजिक वर्जनाओं की बेड़ियों के चलते के चलते उनकी यह हसरत पूरी नहीं हो सकी। विवाह के बाद उनके पति रणजीत सिंह ने उन्हें प्रोत्साहित किया लेकिन समाज बार.बार बसंती की राह में रोड़ा बनकर खड़ा होता रहा।

 

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Basanti Bisht - फोटो : AmarUjala
40 वर्ष की उम्र में पहली बार बसंती को मंच पर चढ़ने का मौका मिला। उस दौरान राज्य आंदोलन चरम पर था। बसंती ने राजधानी के परेड मैदान भर में गढ़वाल सभा के कार्यक्त्रस्म के जरिए मंच पर अपना सफर शुरू किया और उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
 
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बसंती बिष्ट - फोटो : AmarUjala
देश और दुनिया के अलग.अलग हिस्सों में महिला सशक्तिकरण का संदेश देते हुए बसंती ने सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ा। उन्होंने समाज में महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिलाने के लिए हर मोर्चे पर लड़ाई लड़ी। जागरों के माध्यम से उन्होंने महिलाओं के सशक्तिकरण और उनके विकास का मुद्दा उठाया।
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basanti bisht - फोटो : file photo
आज भी दुनिया के अलग.अलग मंचों पर अपने जागरों के माध्यम से वह किशोरी उत्थान और महिलाओं के सशक्तिकरण का संदेश देती हैं।लोक संस्कृति और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में किए जा रहे उनके प्रयासों को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पिछले वर्ष पद्मश्री से सम्मानित किया है।


 
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