राजीव घई
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घई बताते हैं कि देश बंटवारे की भयानक त्रासदी को बुजुर्गों के त्याग को युगों-युगों तक भुलाया नहीं जा सकता है। उनकी कुर्बानी, दुख-दर्द, क्रूर आतताइयों के अत्याचार की कहानी आज भी जहन में ताजा है। उस दौर में इतनी बड़ी संख्या में लोग मरे थे कि कई को अंतिम संस्कार तक नसीब नहीं हुआ। लाशों को गिद्ध नोंच कर खा गए। नन्हें बच्चों को आतताइयों ने भाले की नोक पर टांग कर हत्या कर दी। गुप्तांगों को गोद डाला गया, स्तन काटने जैसी वीभत्स और नारकीय यातनाएं हमारे बुजुर्गों को दी गईं।