यहां से यह दूध तमाम दुकानों, धर्मशालाओं और घरों में पहुंचाया जाता था। हरिद्वार में आसपास के गांवों और कस्बों से भी साइकिलों और बैलगाड़ियों से दूध लाया जाता था। सैकड़ों क्विंटल दूध पूरे दिन आता था, तब कहीं जाकर दूध की आपूर्ति हो पाती थी।
उन दिनों तमाम वन गुर्जर वीरभद्र ऋषिकेश से रायवाला और गंगा पार के जंगलों में अपने मवेशियों के साथ रहते थे। तमाम दूध कुंभ मेलों पर हरिद्वार में आए लाखों यात्रियों और साधुओं के काम आता था। गंगा के रास्ते लाई गई तंबेड़ों को फिर रस्सियां खोलकर कनस्तरों के रूप में तांगों में रायवाला तक वापस ले जाते थे।
लौटते ही तंबेड़ फिर से भरकर हरिद्वार के कुंभ क्षेत्रों में भेज दी जाती थी। उस जमाने में चाय का प्रचलन नहीं था और लोग सुबह शाम दूध ही पिया करते थे।