कुंभ मेला
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उनके साथ बैलगाड़ियों और अन्य वाहनों में अखाड़ों के तमाम जखीरा, हौदे, अस्त्र-शस्त्र एवं अन्य सामान भी होता था। अखाड़ों के हजारों नागा संन्यासी तपस्या के लिए जंगलों में चले जाते थे और अगला कुंभ आने पर वे रमतापंचों की जमातों में शामिल होकर फिर से नगर प्रवेश करते थे। जबकि रमता पंच तीन वर्ष तक गांव-गांव डेरे लगाते थे। वहां धर्म का प्रचार करते और गांव से ही भिक्षा लेते और वार्षिक अन्न भी प्राप्त करते।