महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने ज्ञानकुंभ के उद्घाटन समारोह में अपने 16 मिनट के संबोधन के दौरान शिक्षकों का आह्वान किया कि वह बच्चों में छिपी प्रतिभाएं पहचानकर उन्हें विकसित करें।
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महामहिम राष्ट्रपति का संबोधन बेहद सधा हुआ रहा। ठीक 11 बजकर 16 मिनट पर उन्होंने संबोधन शुरू किया और 11 बजकर 32 मिनट पर संबोधन समाप्त किया।
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उन्होंने कहा कि हर बच्चे के अंदर कोई न कोई प्रतिभा छिपी होती है। उसे संवारने की जिम्मेदारी शिक्षकों पर है।
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उन्होंने चाणक्य का उदाहरण देते हुए कहा कि तक्षशिला विश्वविद्यालय में पढ़े चाणक्य अपनी प्रतिभा के बल पर उसी विश्वविद्यालय के कुलपति भी बने।
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उन्होंने विक्रमादित्य के अंदर छिपी प्रतिभा को पहचानकर उन्हें इस तरह विकसित किया कि विक्रमादित्य दुनिया के सबसे ताकतवर सम्राटों में गिने जाते हैं।
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उन्होंने डा. भीमराव आंबेडकर का भी उदाहरण दिया और कहा कि जहां डा. भीमराव आंबेडकर पढ़ा करते थे। वहां आंबेडकर नाम के एक शिक्षक उन्हें पढ़ाया करते थे।
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उन्होंने भीमराव की प्रतिभा को पहचाना और हर तरीके से बाद में जब भीमराव ने अपनी शिक्षा पूरी की और अपने गुरु के पास आशीर्वाद लेने गए तो गुरु ने अपना उपनाम उन्हें सौंप दिया। तभी से भीमराव को डा. भीमराव आंबेडकर के नाम से पुकारा जाता है। इसी तरह शिक्षकों को बच्चों के अंदर छिपी प्रतिभाओं को पहचानकर उन्हें गढ़ना चाहिए।
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महामहिम राष्ट्रपति ने देश के पूर्व राष्ट्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम का भी जिक्र किया। साथ ही देश के प्रख्यात शिक्षाविद डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को भी याद किया। उन्होंने कहा कि यह दोनों लोग शिक्षा जगत की जीती जागती मिसाल हैं।
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उन्होंने कहा कि डा. कलाम के अंदर का शिक्षक तो जीवन भर सक्रिय रहा। राष्ट्रपति का अपना कार्यकाल समाप्त होते ही वह अपने शिक्षण कार्य में जुट गए थे।
राष्ट्रपति ने उम्मीद जताई कि आध्यात्मिक कुंभों की पावन भूमि हरिद्वार पर होने वाला यह कुंभ बेहद सफल होगा और शिक्षा में गुणवत्ता के बेहतर अवसर प्रदान करेगा।