देवभूमि में मनुष्य ही नहीं, देवता भी श्राद्धपक्ष में पितृों को तर्पण देते हैं। जी हां, यह बिल्कुल सच है। दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए तर्पण करने को भगवान यहां खुद दर्शन देते हैं।
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रुद्रप्रयाग जिले के जखोली ब्लाक पूर्वी बांगर में अनंत चतुर्दशी के पर्व पर भगवान नागनाथ घुणेश्वर महाराज दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए श्राद्ध कर तर्पण देते हैं। इस मौके पर यहां मेला का आयोजन होता है, जिसे तोषी मेला कहा जाता है।
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बांगर क्षेत्र के डांगी, बक्सीर, भुनालगांव, खोड़ और मथ्या गांव में भगवान नागनाथ घुणेश्वर आराध्य देव हैं। श्राद्ध पक्ष के शुभारंभ पर भगवान घुणेश्वर पूर्व में बक्सीर व अब, डांगी गांव से गाजे-बाजे के साथ अपने मूल मंदिर भैंसारी पहुंचते हैं। यहां विशेष धार्मिक अनुष्ठान होता है।
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धर्मकूप, मणिकर्णिका और दशाश्वमेध पर तर्पण-अर्पण और पिंडदान के लिए उमड़ेंगे वंशज
- फोटो : अमर उजाला
इस मौके पर भगवान अपने पश्वा पर अवतरित होते हैं, जो मंदिर के गर्भगृह में दिवंगत आत्माओं को तर्पण देते हैं। करीब दस से 15 मिनट तक होने वाली इस पूजा-अर्चना में भगवान चांदी की थाल में जौ, तिल, गाय दूध व पानी से दिवंगत तर्पण देकर उनका श्राद्ध करते हैं।
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पितृपक्ष
- फोटो : SOCIAL MEDIA
मंदिर के अंदर पुजारी, पश्वा और कुछ हक-हकूकधारी रहते हैं, जिस दूध व जल से आराध्य द्वारा तर्पण दिया जाता है । इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद क्षेत्र के शुद्धीकरण के लिए बारिश होती है। ग्रामीण नवरीन सेमवाल, नरेश भट्ट, उमेद सिंह बताते हैं कि बचपन से वे इस परंपरा को देखते आ रहे हैं।
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कहा जाता है कि मगरु मेतवाल ग्रामीण की गाय हमेशा जंगल में जाकर एक स्थान पर अपना दूध चढ़ाती थी। एक दिन मगरु गाय के पीछे गया, जहां पर वह अपना दूध चढ़ाती उस स्थान पर कुल्हाड़ी से प्रहार किया, लेकिन गाय अदृश्य हो गई और वहां पर खंडित शिवलिंग प्रकट हो गया।
ग्रामीण ने गो हत्या से मुक्ति के लिए शिव मंदिर बनाने का काम शुरू किया, लेकिन कई प्रयास के बाद भी मंदिर की नींव ढह रह थी। यह देख, मगरू ने देवता को खुश करने के लिए अपने बड़े बेटे-बहू की बलि दे दी, जिसके बाद मंदिर का निर्माण पूरा हो सका। मगरु की समर्पण भावना देखकर भगवान प्रकट हुए और स्वयं उसके बेटे- बहु की आत्मा की शांति के लिए मौके पर तर्पण देकर श्राद्ध करा। तब से परंपरा का निर्वहन हो रहा है।